मध्य प्रदेश के डिंडौरी में आदिवासियों द्वारा पूजा जाने वाला पत्थर निकला 6.5 करोड़ साल पुराना कोरल फॉसिल

मध्य प्रदेश के डिंडौरी में आदिवासी समुदाय द्वारा सालों से पूजे जा रहे दैवीय पत्थर की जांच में यह 6.5 करोड़ साल पुराना दुर्लभ कोरल फॉसिल निकला है।

Aug 10, 2026 - 16:26
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मध्य प्रदेश के डिंडौरी में आदिवासियों द्वारा पूजा जाने वाला पत्थर निकला 6.5 करोड़ साल पुराना कोरल फॉसिल

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग साढ़े चार सौ किलोमीटर दूर स्थित आदिवासी बहुल जिला डिंडौरी में एक हैरान कर देने वाला वैज्ञानिक खुलासा हुआ है। यहाँ के जंगलों में जिस पत्थर को स्थानीय जनजाति वर्ग के लोग सदियों से एक 'दैवीय पत्थर' मानकर पूरी आस्था के साथ पूजते आ रहे थे, वह विस्तृत वैज्ञानिक जांच में एक अत्यंत दुर्लभ कोरल फॉसिल (मूंगा जीवाश्म) निकला है। डिंडौरी और आसपास के बैगा समुदाय के लोगों ने पीढ़ियों से इस दैवीय पत्थर की रक्षा की है। अब मध्य प्रदेश पुरातत्व, अभिलेखागार और संग्रहालय निदेशालय की वैज्ञानिक टीम ने डायनासोर काल से जुड़े इस प्राचीन पत्थर को आधिकारिक तौर पर दुर्लभ कोरल फॉसिल घोषित कर दिया है।

🌍 दुनिया की अंतिम निशानियों में से एक है यह दुर्लभ जीवाश्म

डिंडौरी के इस अनोखे और दुर्लभ पत्थर को लेकर लगातार मिल रही खबरों के बाद पुरातत्व निदेशालय की एक विशेष टीम ने घने जंगलों के बीच बने मंदिर जैसी दिखने वाली इस अजीब संरचना की गहन पहचान की। शुरुआत में पत्थरों की इस परतनुमा और एक के ऊपर एक सजी संरचना को देखकर पुरातत्व से जुड़े वैज्ञानिक भी अचंभित रह गए थे। इसे लेकर कई प्रकार के वैज्ञानिक सवाल खड़े हुए थे, जिसके बाद वैज्ञानिकों की पूरी टीम ने मौके पर जाकर इसकी वैज्ञानिक जाँच की। आखिरकार जाँच में यह स्पष्ट हो गया कि यह कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि एक बेहद दुर्लभ कोरल जीवाश्म है।

🦖 हजारों-लाखों साल पुराने डायनासोर युग की है यह अमूल्य निशानी

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधिकारी व प्रसिद्ध पुरातत्वविद् डॉ. मनोज कुमार कुर्मी इस संदर्भ में बताते हैं कि "यह उस प्राचीन दौर की एक जीवंत निशानी है, जो अब इस दुनिया से पूरी तरह समाप्त हो चुका है। उस कालखंड में आज के मध्य प्रदेश का नर्मदा घाटी वाला क्षेत्र ऐसा था जहाँ 'राजासौरस नर्मदेन्सिस' जैसे विशालकाय डायनासोर विचरण किया करते थे और यह पूरा इलाका एक सक्रिय ज्वालामुखी का मैदान हुआ करता था।"

उन्होंने आगे बताया कि जब पृथ्वी पर अंतरिक्ष से लगभग 10 किलोमीटर चौड़ा एक विशाल एस्टेरॉयड (क्षुद्रग्रह) टकराया, तो भारत के दक्कन ट्रैप्स (Deccan Traps) में एक भयंकर ज्वालामुखी विस्फोट हुआ। इसके बाद पृथ्वी की बदली हुई परिस्थितियों के कारण डायनासोर युग का अंत हो गया और इसके बाद छोटे आकार के नए जीव-जंतुओं की उत्पत्ति हुई। यह कोरल फॉसिल भी ठीक उसी प्राचीन और ऐतिहासिक कालखंड का एक अनमोल अवशेष है।

🛡️ आदिवासी समुदाय की सतर्कता से सुरक्षित रहा यह ऐतिहासिक खजाना

पुरातत्व विभाग के आयुक्त मदन कुमार नागरमोजे का कहना है कि "हमारे राज्य का आदिवासी समुदाय हमेशा से प्रकृति से जुड़ा रहा है। वे भले ही वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली नहीं जानते थे, लेकिन वे यह भली-भांति समझते थे कि यह कोई बेहद अनूठा और दुर्लभ अवशेष है। यही वजह है कि वे न केवल इसकी नियमित पूजा करते आए हैं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसकी पूरी सुरक्षा भी करते रहे हैं।" उन्होंने बताया कि इस फाॅसिल पर किए गए तमाम आधुनिक परीक्षणों (Tests) में इसके वैज्ञानिक रूप से दुर्लभ होने के अकाट्य प्रमाण मिले हैं।

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