MP High Court News: न्यायिक आदेशों का उपहास बर्दाश्त नहीं, एफसीआई के दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने न्यायिक आदेश को दरकिनार करने पर एफसीआई को फटकार लगाई। कोर्ट ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और जवाबदेही तय करने का दिया निर्देश।

Jun 10, 2026 - 15:21
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MP High Court News: न्यायिक आदेशों का उपहास बर्दाश्त नहीं, एफसीआई के दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्रीष्म अवकाशकालीन युगलपीठ ने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अधिकारियों के मनमाने रवैये पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति दीपक खोत की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायिक आदेश को किसी विभागीय फरमान के जरिए निष्प्रभावी बनाने की कोशिश न केवल कानून के शासन के खिलाफ है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाने जैसा है।

 क्या है पूरा मामला?

हाई कोर्ट अर्जुन पटेल और अब्दुल खालिद दानिश के नियमितीकरण से संबंधित एक प्रकरण पर सुनवाई कर रहा था। लेबर कोर्ट ने इन कर्मचारियों के पक्ष में नियमितीकरण का आदेश दिया था। एफसीआई ने इस आदेश के खिलाफ पहले सिंगल बेंच और फिर डिवीजन बेंच में याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान खुलासा हुआ कि एफसीआई के अधिकारियों ने लेबर कोर्ट के आदेश के बावजूद उसे चुनौती देने के बजाय मनमाने ढंग से एक विभागीय आदेश जारी कर दिया था, ताकि न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी बनाया जा सके।

 कोर्ट की फटकार: केवल नोटिस काफी नहीं

अदालत ने एफसीआई से तीखे सवाल पूछे कि लेबर कोर्ट के आदेश के विरुद्ध अपील दाखिल करने में देरी क्यों हुई? कोर्ट ने अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि वे लेबर कोर्ट के आदेश से असहमत थे, तो उन्हें कानून के निर्धारित मंच पर अपील करनी चाहिए थी, न कि विभागीय आदेश का सहारा लेना चाहिए था। हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया कि दोषी अधिकारियों के खिलाफ केवल 'कारण बताओ नोटिस' जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह साबित करना होगा कि उनकी वास्तविक जवाबदेही कैसे तय की गई।

 तीन सप्ताह में मांगा जवाब

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि अधिकारियों की मनमानी के कारण अनावश्यक मुकदमेबाजी बढ़ती है, सरकारी खजाने पर बोझ पड़ता है और अदालतों का बहुमूल्य समय बर्बाद होता है। फिलहाल, एफसीआई को अपना जवाब और की गई कार्रवाई का विवरण प्रस्तुत करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया गया है। अगली सुनवाई में कोर्ट यह सुनिश्चित करेगा कि दोषी अधिकारियों पर क्या दंडात्मक कार्रवाई की गई।

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