खरगोन: अपनी जमीन बचाने के लिए तहसील कार्यालय पर डटे किसान, उद्योगपतियों को जमीन देने के विरोध में घेराव
खरगोन के दगड़खेड़ी में जमीन विवाद। ग्रामीणों का आरोप कि पीढ़ियों पुरानी खेती की जमीन को सरकारी बताकर उद्योगपतियों को दिया जा रहा है। किसान तहसील परिसर में डटे।
खरगोन। खरगोन जिले के दगड़खेड़ी गांव के सैकड़ों किसान अपनी पैतृक जमीन को बचाने के लिए आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। सोमवार से ही बड़ी संख्या में किसान, जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं, तहसील परिसर में डेरा डाले हुए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि वे पीढ़ियों से जिस जमीन पर खेती कर रहे हैं और जिसके उनके पास वैध पावती-पट्टे मौजूद हैं, उसे प्रशासन अब 'शासकीय' घोषित कर औद्योगिक क्षेत्र बनाने की तैयारी कर रहा है।
250 किसानों के अधिकारों पर संकट
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे 'जागृत आदिवासी दलित संगठन' के बलिराम सोलंकी और शिवराम कनासे ने बताया कि वर्ष 2022 से वे लगातार मुख्यमंत्री, कलेक्टर और स्थानीय प्रशासन को आवेदन दे रहे हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। करीब 500 एकड़ जमीन, जो 250 किसानों के नाम पर दर्ज थी, उसे सरकारी रिकॉर्ड से गायब कर दिया गया है। इससे न केवल किसान अपनी भूमि से बेदखल हो रहे हैं, बल्कि वे सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित हो रहे हैं।
तहसील परिसर में गुजारी रात, जारी रहेगा प्रदर्शन
किसानों का गुस्सा इस बात को लेकर है कि उनकी उपजाऊ जमीन उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रची जा रही है। अपनी मांग के समर्थन में किसान सोमवार रात से ही तहसील परिसर में खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। उन्होंने परिसर में ही भोजन बनाकर अपना प्रदर्शन जारी रखा है। किसानों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि जब तक राजस्व रिकॉर्ड में सुधार कर जमीन उनके नाम वापस नहीं की जाती, तब तक यह प्रदर्शन समाप्त नहीं होगा। यदि मांगें पूरी नहीं हुईं, तो वे कलेक्टर कार्यालय का घेराव करने के लिए बाध्य होंगे।
प्रशासन की चुप्पी और एसडीएम का रुख
इस मामले पर राजस्व अधिकारियों ने अब तक कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी है। हालांकि, स्थिति की गंभीरता को देखते हुए खरगोन एसडीएम सत्येंद्र बैरवा ने मंगलवार देर शाम भगवानपुरा पहुंचकर पूरे मामले की पड़ताल करने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा है कि स्थानीय स्तर पर वस्तुस्थिति समझने के बाद ही कोई ठोस निर्णय लिया जा सकेगा।
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