व्यक्तिगत यूजर आईडी से टिकट बुक करने के मामले में HC ने दी राहत, क्रिमिनल केस किया खारिज

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अधिकृत एजेंट के खिलाफ रेलवे एक्ट की धारा 143 के तहत अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने पेंडिंग क्रिमिनल केस को रद्द कर दिया है।

Aug 24, 2026 - 14:58
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व्यक्तिगत यूजर आईडी से टिकट बुक करने के मामले में HC ने दी राहत, क्रिमिनल केस किया खारिज

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की एकलपीठ ने रेलवे से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि अधिकृत एजेंट के खिलाफ रेलवे एक्ट की धारा 143 के तहत अपराध नहीं बनता है। न्यायमूर्ति हिमांशु जोषी की एकलपीठ ने इस अहम टिप्पणी के साथ रेलवे कोर्ट के एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) के समक्ष लंबित आपराधिक प्रकरण को पूरी तरह से निरस्त करने के आदेश जारी किए हैं। इस फैसले से रेलवे ई-टिकटिंग से जुड़े कारोबारियों को बड़ी राहत मिली है।

🚆 आरपीएफ ने पर्सनल आईडी से टिकट बुक करने पर दर्ज किया था केस

याचिकाकर्ता अविनाश कुमार सोनी की ओर से दायर याचिका में पैरवी करते हुए अधिवक्ता विशाल डेनियल ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता वर्ष 2015 से आईआरसीटीसी (IRCTC) का अधिकृत ई-टिकटिंग एजेंट है और सिंगरौली में उसका साइबर कैफे है। मामले के अनुसार, रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (RPF) के अधिकारियों ने उसके साइबर कैफे पर छापा मारकर दो रेलवे टिकट जब्त किए थे, जो अधिकृत एजेंट आईडी के बजाय याचिकाकर्ता की पर्सनल आईडी से जारी किए गए थे। इसी आधार पर आरपीएफ ने उसके खिलाफ रेलवे एक्ट, 1989 की धारा 143 के तहत मामला दर्ज कर सक्षम रेलवे कोर्ट में चार्जशीट पेश कर दी थी।

📋 सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को दी राहत

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि वह अधिकृत एजेंट है और ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि वह रेलवे टिकटों के अवैध या अनधिकृत कारोबार में लिप्त था। छापेमारी के समय याचिकाकर्ता दुकान पर मौजूद भी नहीं था, बल्कि वह वाराणसी में चार्टर्ड अकाउंटेंसी (CA) की पढ़ाई कर रहा था। वहीं, छापेमारी के दौरान उसके पिता को हिरासत में लेकर कंप्यूटर, प्रिंटर और आईआरसीटीसी डोंगल जब्त कर लिया गया था।

हाई कोर्ट की एकलपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि आरोप केवल टिकट बुक करने के तरीके (पर्सनल आईडी के इस्तेमाल) तक सीमित है। यदि इस आरोप को सही भी मान लिया जाए, तब भी यह रेलवे अधिनियम की धारा 143 के दायरे में दंडनीय अपराध नहीं बनता है। अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद लंबित आपराधिक प्रकरण को रद्द करने के निर्देश दे दिए हैं।

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