शहडोल में हरछठ व्रत की तैयारियां शुरू, 36 साल बाद बन रहा है बेहद दुर्लभ संयोग, जानें पूजा विधि और महत्व

शहडोल समेत विंध्य क्षेत्र में हरछठ (हलषष्ठी) व्रत की तैयारियां जोरों पर हैं। 36 साल बाद बने दुर्लभ संयोग के बीच महिलाएं संतान की लंबी उम्र के लिए यह व्रत रखेंगी।

Aug 24, 2026 - 15:16
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शहडोल में हरछठ व्रत की तैयारियां शुरू, 36 साल बाद बन रहा है बेहद दुर्लभ संयोग, जानें पूजा विधि और महत्व

भारतीय संस्कृति अपनी अनूठी विविधताओं और परंपराओं के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है। यहाँ कई ऐसे रीति-रिवाज हैं जो बेहद अद्भुत और अविश्वसनीय हैं। मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में ऐसा ही एक पावन त्योहार 'हरछठ व्रत' (जिसे हलषष्ठी भी कहा जाता है) बड़े ही उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है, जिसका महिलाएं सालभर बेसब्री से इंतजार करती हैं। विंध्य क्षेत्र की माताएँ और बहनें अपनी संतान की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना के लिए इस व्रत को पूरी निष्ठा और कठिन नियमों के साथ संपन्न करती हैं। इस बार हरछठ का यह पर्व बुधवार, 2 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा।

✨ 36 साल बाद बन रहा अद्भुत संयोग, जानिए कैसे की जाती है पूजा और क्या हैं नियम

ज्योतिषचार्य पंडित सुशील शुक्ला शास्त्री के अनुसार, इस वर्ष हरछठ का व्रत बेहद खास है क्योंकि इस बार 'ध्रुव योग' (यानी संकल्प की निश्चित प्राप्ति) और 'अमृत सिद्धि योग' का अत्यंत दुर्लभ संयोग बन रहा है। ऐसा योग लगभग 36 साल बाद आया है। इस व्रत की शुरुआत में महिलाएं सुबह-सुबह किसी नदी या तालाब में स्नान करती हैं। इसके बाद घर के आंगन या सामने मिट्टी का छोटा सा गड्ढा नुमा तालाब बनाकर उसमें पानी और दूध भरा जाता है। इसके चारों तरफ आम के छोटे पौधे और फूल लगाए जाते हैं। साथ ही मिट्टी से हाथी, घोड़े और अन्य आकृतियां बनाकर दूध, दही और महुआ से विधि-विधान पूजन किया जाता है।

इस व्रत की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता यह है कि इसमें उस अनाज या वस्तु का सेवन बिल्कुल वर्जित होता है, जिसकी पैदावार खेत में हल चलाने से हुई हो (क्योंकि हल को भगवान बलराम का शस्त्र माना गया है)। इस दिन केवल वही चीजें खाई जाती हैं जो बिना जुताई के प्राकृतिक रूप से उगती हैं। व्रत के दौरान केवल पसही का चावल (जंगली चावल), भैंस का दूध-दही-घी और जंगली पड़ोरा (कंटोला) की सब्जी का ही उपयोग किया जाता है।

🛒 बाजारों में बढ़ी रौनक, सात प्रकार के अन्न और जंगली पड़ोरा का है विशेष महत्व

हरछठ पर्व को लेकर शहडोल के बाजारों में भी रौनक लौटने लगी है। पूजन में उपयोग होने वाली लकड़ी की छोटी-छोटी टोकनियां और अन्य सामग्री बिकने लगी हैं। कल्याणपुर की रहने वाली मीनू पांडे बताती हैं कि महिलाएं इस व्रत की तैयारी सालभर पहले से ही शुरू कर देती हैं, क्योंकि इसमें लगने वाली पूजन सामग्री और खाने-पीने की चीजें हर सीजन में आसानी से नहीं मिलतीं। इस दिन धान, गेहूं, मक्का, चना, मूंग, सेम और अरहर सहित कुल सात प्रकार के अन्न की पूजा का विशेष विधान है।

इसके साथ ही, इस व्रत में खाई जाने वाली जंगली पड़ोरा (कंटोला) की सब्जी सेहत के लिए बेहद गुणकारी मानी जाती है। आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. अंकित नामदेव बताते हैं कि पड़ोरा में परवल और करेला दोनों के गुण पाए जाते हैं, जो मधुमेह (डायलिसिस/शुगर), हृदय रोगियों और पेट की समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए वरदान साबित होता है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार भी प्राकृतिक रूप से उगने वाला पसही का चावल अत्यधिक पोषक तत्वों से भरपूर होता है, जो इस पर्व की परंपरा के साथ-साथ स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहद लाभदायक है।

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