गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजाति 'शल्यकर्णी' की श्यामगिरी जंगलों में पुष्टि, कैंसर रोधी गुणों से है लैस

पन्ना के श्यामगिरी जंगलों में दुर्लभ और संकटग्रस्त औषधीय वृक्ष शल्यकर्णी पाया गया है। दक्षिण पन्ना वनमंडल की जैवविविधता और इसके वैज्ञानिक महत्व को जानें।

Sep 05, 2026 - 14:00
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गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजाति 'शल्यकर्णी' की श्यामगिरी जंगलों में पुष्टि, कैंसर रोधी गुणों से है लैस

दक्षिण पन्ना वनमंडल के कल्दा वन परिक्षेत्र के अंतर्गत आने वाले श्यामगिरी के घने और प्राकृतिक जंगलों में एक बेहद दुर्लभ औषधीय वृक्ष 'शल्यकर्णी' की मौजूदगी सामने आई है। मध्य भारत में गंभीर रूप से संकटग्रस्त मानी जाने वाली इस वनस्पति प्रजाति का श्यामगिरी के जंगलों में पाया जाना दक्षिण पन्ना की असाधारण जैवविविधता और क्षेत्र के संरक्षण महत्व को एक बार फिर रेखांकित करता है। इस दुर्लभ प्राकृतिक धरोहर की खोज की पुष्टि प्रकृति एवं जैवविविधता संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय अजय चौरसिया और वन विभाग के वनपाल अमित रैकवार द्वारा इसकी तस्वीरें व जानकारियां साझा करके की गई है।

💊 पारंपरिक औषधीय गुणों से भरपूर है शल्यकर्णी, प्रयोगशाला अध्ययनों में कैंसर-रोधी संभावनाओं के संकेत

शल्यकर्णी (Dilleniaceae) कुल का मध्यम आकार का पर्णपाती वृक्ष है, जिसे स्थानीय स्तर पर कल्लई, अग्गई, करकट, सुआरुख और करमल जैसे नामों से भी पुकारा जाता है। मध्य भारत के जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान में इसके विभिन्न हिस्सों के औषधीय उपयोग दर्ज हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के मुताबिक इसके अर्क में फ्लेवोनॉइड, फिनॉल, टैनिन और टरपेनॉइड जैसे जैव सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं। प्रारंभिक प्रयोगशाला परीक्षणों में इसमें एंटीऑक्सीडेंट, जीवाणुरोधी, मधुमेह-रोधी और कुछ प्रकार की कोशिकाओं के विरुद्ध साइटोटॉक्सिक व कैंसर-रोधी गुण होने की संभावनाएं मिली हैं, हालांकि मानव उपचार में इसके उपयोग से पहले विस्तृत चिकित्सकीय अध्ययन जरूरी हैं।

🌱 प्राकृतिक पुनर्जनन है बड़ी चुनौती, 'बुंदेलखंड की पचमढ़ी' के नाम से मशहूर है श्यामगिरी का यह अनूठा जंगल

इस दुर्लभ वृक्ष के संरक्षण में सबसे बड़ी चुनौती इसका कठिन प्राकृतिक पुनर्जनन है, क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में इसके बीजों की अंकुरण क्षमता काफी कम होती है। वनमंडल अधिकारी अनुपम शर्मा के अनुसार श्यामगिरी का जंगल केवल हरियाली का क्षेत्र नहीं बल्कि एक जीवंत प्राकृतिक धरोहर है। यहाँ सतावर, सफेद मूसली, महुआ, हर्र, बहेड़ा, अर्जुन और ब्राह्मी जैसी बेशकीमती जड़ी-बूटियों के साथ-साथ पूर्व में दुर्लभ कीटभक्षी पौधा 'ड्रोसेरा' भी मिल चुका है। अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता और वनस्पतियों की प्रचुरता के कारण ही इस पूरे क्षेत्र को 'बुंदेलखंड की पचमढ़ी' कहा जाता है, जो वैज्ञानिक शोध और संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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