डॉक्टर बनने का सपना देख रहे गरीब परिवार के मेधावी छात्र ओम चौकसे की सफलता की कहानी
जबलपुर के ओम चौकसे ने सड़क किनारे दुकान चलाने वाले पिता के संघर्षों के बीच NEET, JEE और CUET परीक्षा पास कर सफलता की नई मिसाल कायम की है।
कहावत है कि 'होनहार बिरवान के होत चीकने पात', जिसका अर्थ है कि प्रतिभाशाली बच्चों के लक्षण बचपन से ही नजर आने लगते हैं। मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर के रहने वाले ओम चौकसे ने इस बात को पूरी तरह सच साबित कर दिखाया है। नेपियर टाउन के एक छोटे से घर में रहने वाले ओम के पिता पंडित लज्जाशंकर झा स्कूल के सामने सड़क किनारे बैग बेचने की छोटी सी दुकान लगाते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद साधारण होने और जीवन में तमाम कठिनाइयां होने के बावजूद ओम ने अपनी कड़ी मेहनत, दृढ़ संकल्प और असाधारण प्रतिभा के दम पर वे कर दिखाया जो कई लोगों के लिए एक सपना होता है।
🩺 एक ही प्रयास में NEET, JEE और CUET में सफलता, नीट में हासिल किए 521 अंक
ओम चौकसे ने अपनी स्कूली शिक्षा जबलपुर के पंडित लज्जाशंकर झा मॉडल हाई स्कूल से पूरी की, जहाँ से उन्होंने 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षाओं की मेरिट सूची में अपना स्थान बनाया था। इसके बाद उन्होंने एक साथ तीन बड़ी प्रवेश परीक्षाएं—NEET, JEE और CUET पास कर डालीं। नीट-यूजी 2026 में ओम ने 521 अंक हासिल किए, जिसके आधार पर उन्हें उज्जैन के एक निजी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश का अवसर मिला और उन्होंने वहां दाखिला भी ले लिया है। चूंकि वे मध्य प्रदेश सरकार की मुख्यमंत्री मेधावी विद्यार्थी योजना के सभी पात्रता मानकों को पूरा करते हैं, इसलिए उन्हें उम्मीद है कि सरकार की ओर से मेडिकल की फीस में आर्थिक सहायता मिल जाएगी। साथ ही, ओबीसी वर्ग से आने वाले ओम को काउंसलिंग के अगले दौर में किसी सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट मिलने की भी पूरी उम्मीद है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मंच पर किया सम्मानित, संघर्षों से भरी रही है सफलता की राह
ओम के पिता की आमदनी पूरी तरह स्थायी नहीं है और सड़क किनारे दुकान होने के कारण कई बार प्रशासनिक कार्रवाई का सामना भी करना पड़ता है, लेकिन इन तमाम आर्थिक परेशानियों ने कभी भी ओम के हौसले को डिगने नहीं दिया। उनकी इस प्रेरणादायक सफलता की गूंज राजधानी भोपाल तक पहुँची, जहाँ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक भव्य कार्यक्रम में ओम को मंच पर बुलाकर विशेष रूप से सम्मानित किया। सड़क किनारे पिता की छोटी सी दुकान से लेकर मेडिकल कॉलेज के क्लासरूम तक का ओम का यह सफर उन सभी बच्चों के लिए एक मिसाल है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं और उन्हें सच करने का जज्बा रखते हैं।
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