सड़क किनारे के खेतों में अफलन की समस्या, 40 से अधिक किसानों की फसल हुई प्रभावित

रतलाम के करमदी गांव में फोरलेन बाईपास की लाइटों के कारण सोयाबीन और मक्का की फसल में अफलन की समस्या सामने आई है। पौधे लंबे हो रहे हैं लेकिन फलियां नहीं लग रही हैं।

Sep 06, 2026 - 17:40
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सड़क किनारे के खेतों में अफलन की समस्या, 40 से अधिक किसानों की फसल हुई प्रभावित

मध्य प्रदेश में तेजी से विकसित हो रहे हाईवे और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स जहां एक ओर आवागमन को सुगम बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इसके कुछ अनपेक्षित दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं। रतलाम जिले के करमदी गांव में एक बेहद अनोखी और चौंकाने वाली समस्या देखने को मिली है, जहाँ फोरलेन बाईपास पर रातभर जलने वाली हाई-मास्ट लाइटों और वाहनों की तेज रोशनी के कारण सड़क किनारे स्थित खेतों में खड़ी सोयाबीन और मक्का की फसल प्रभावित हो रही है। इन फसलों में सामान्य से अधिक ग्रोथ तो हुई है, लेकिन पौधों पर फूल और फलियां न आने के कारण किसान भारी चिंता में हैं। प्रभावित किसानों ने अब इस पूरे मामले की शिकायत कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से की है।

🌱 किसानों का दर्द और कृषि वैज्ञानिकों की राय—क्या है 'फोटोपेरियोडिज्म' का असर?

किसान ओमप्रकाश पाटीदार और मनोहर पाटीदार ने बताया कि सड़क किनारे बोई गई सोयाबीन की फसल 3 से 4 फीट ऊंची हो चुकी है और मक्का के पौधों में भी भुट्टे नहीं आए हैं, जबकि सड़क से दूर स्थित अन्य खेतों में फसल बिल्कुल सामान्य और स्वस्थ है। मंदसौर के कृषि वैज्ञानिक रोशन गलानी ने इस समस्या पर प्रकाश डालते हुए बताया कि दिन की प्राकृतिक रोशनी के साथ-साथ यदि रात में भी लगातार कृत्रिम प्रकाश पौधों पर पड़ता रहे, तो पौधे का 'फोटोपेरियोडिज्म' चक्र प्रभावित होता है, जिससे पौधे को आराम नहीं मिलता और वह केवल वानस्पतिक वृद्धि (लंबाई) कर अफलन की स्थिति में चले जाते हैं।

🔍 कृषि विभाग ने लिया संज्ञान, टीम भेजकर स्थिति का परीक्षण कराने का दिया आश्वासन

इस अनोखी समस्या के मीडिया के माध्यम से सामने आने के बाद जिला कृषि अधिकारी आर.एस. अर्गल ने तुरंत संज्ञान लिया है। उन्होंने कहा कि कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिकों के एक दल को जल्द ही करमदी गांव के प्रभावित खेतों में भेजा जाएगा, जो मौके पर जाकर पूरी स्थिति का वैज्ञानिक परीक्षण करेंगे। अधिकारियों का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इस समस्या के पीछे कृत्रिम रोशनी का कितना प्रभाव है, और उसके आधार पर किसानों को उचित समाधान व मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा।

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