आधुनिकता के दौर में विलुप्त होती अखाड़ा परंपरा को मिला नया जीवन; बच्चों ने बनाई देसी अखाड़ों की थीम पर झांकी
बुरहानपुर के गंगानगर में बच्चों ने कबाड़ के सामान से देसी अखाड़ों की थीम पर आकर्षक झांकी बनाई। वहीं नागझिरी में ईको-फ्रेंडली गणेशजी स्थापित किए गए।
बुरहानपुर। बुरहानपुर शहर में गणेशोत्सव की जबरदस्त धूम देखने को मिल रही है। विभिन्न पूजा पंडालों में भगवान श्री गणेश जी की अत्यंत सुंदर और आकर्षक प्रतिमाएं विराजित की गई हैं।
शहर के गंगानगर क्षेत्र में इस बार 'देसी अखाड़ों' की थीम पर एक बेहद अनोखी झांकी तैयार की गई है। इस झांकी में मूषक मंडली (चूहों) को अखाड़ा खेलते हुए दर्शाया गया है। झांकी में मूषक मंडली ढोल की थाप पर लेझिम, मलखंभ और अखाड़े के हैरतअंगेज करतब करती नजर आ रही है। स्थानीय बच्चों ने घर में रखी कबाड़ की पुरानी वस्तुओं का इस्तेमाल कर इसे बेहद खूबसूरत तरीके से सजाया है, जिसे देखकर श्रद्धालु दंग रह जाते हैं।
🥁 विसर्जन जुलूस से विलुप्त हो रही अखाड़ा परंपरा: डीजे के शोर के बीच संस्कृति को सहेजने का प्रयास
उल्लेखनीय है कि गणेशोत्सव के बाद विसर्जन पर्व पर बड़ी प्रतिमाओं का भव्य चल समारोह (विसर्जन जुलूस) शहर के मुख्य मार्गों से निकाला जाता है।
दशकों पहले इस विसर्जन जुलूस का मुख्य आकर्षण स्थानीय अखाड़े होते थे, जिनमें मलखंभ, लेझिम, ढोल-नगाड़ों के साथ पारंपरिक साहसिक करतब दिखाए जाते थे। हालांकि, आधुनिकता के दौर में अखाड़ों की यह समृद्ध परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त हो गई है। अब आयोजक जुलूस में डीजे और हाई-डेसिबल लाउडस्पीकर जैसे आधुनिक उपकरणों का उपयोग करने लगे हैं, जिससे न केवल यह प्राचीन परंपरा समाप्त हो रही है, बल्कि भारी ध्वनि प्रदूषण भी होता है।
🛠️ डेढ़ महीने की कड़ी मेहनत से बच्चों ने तैयार की झांकी: कबाड़ की मोटर, पाइप और लाइटिंग का किया इस्तेमाल
विलुप्त हो चुकी अखाड़ा परंपरा को पुनर्जीवित करने और नई पीढ़ी को इससे परिचित कराने के उद्देश्य से गंगानगर निवासी स्कूली छात्र हितार्थ और सिद्धांत ने यह विशेष थीम सोची।
दोनों बच्चों ने स्कूल से आने के बाद प्रतिदिन मेहनत कर करीब डेढ़ महीने में इस झांकी को आकार दिया। बच्चों ने कबाड़ में पड़ी पुरानी मोटर, पाइप, वायरिंग, लाइटिंग और पुरानी बैटरियों का इस्तेमाल कर इसे तैयार किया। इससे पहले परिवार के संदीप कुमार रावल, तेजस रावल और तुषार रावल झांकियां बनाते थे। रावल परिवार पिछले 10 वर्षों से लगातार समाज को जागरूक करने वाली प्रेरणादायक झांकियां बनाता आ रहा है।
📢 "प्राचीन परंपरा को दोबारा जीवित करने का संदेश": आयोजकों ने बताया झांकी का मुख्य उद्देश्य
छात्र हितार्थ रावल ने बताया, "परिवार के बड़े सदस्यों को झांकियां बनाते देख हमने यह हुनर सीखा है। इस बार हमने अखाड़ों की थीम इसलिए चुनी ताकि अपनी लुप्त होती संस्कृति को दोबारा सामने लाया जा सके।"
सिद्धांत रावल ने कहा, "पहले गणेशोत्सव में अखाड़ों का बहुत महत्व था, लेकिन अब डीजे और बैंड-बाजे का चलन बढ़ गया है। हम झांकी के माध्यम से पुरानी परंपरा का संदेश देना चाहते थे।" वहीं आयोजन से जुड़ी हर्षिता रावल ने बताया कि परिवार के सभी सदस्यों ने मिलकर वेस्ट (कबाड़) मटेरियल से इस जीवंत झांकी का निर्माण किया है।
🌊 ताप्ती नदी को प्रदूषण से बचाने का संकल्प: नागझिरी में विराजे 'ईको-फ्रेंडली' बप्पा
अखाड़ा झांकी के अलावा बुरहानपुर के नागझिरी क्षेत्र में जल संरक्षण का संदेश देती एक और अनोखी पहल देखने को मिली है। यहां रुपेश प्रजापति और अश्विन नवलखे ने जल प्रदूषण को रोकने के उद्देश्य से भगवान गणेश की पूर्णतः 'ईको-फ्रेंडली' (मिट्टी की) प्रतिमा तैयार की है।
'नागझिरी घाट के राजा' के दर्शन के लिए रोजाना भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है। बुरहानपुर शहर से होकर सूर्यपुत्री ताप्ती नदी बहती है, जो पूरे शहर की जीवनदायिनी है। ताप्ती नदी के जल को प्रदूषण मुक्त रखने और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने के लिए ही इस ईको-फ्रेंडली प्रतिमा की स्थापना की गई है।
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