भोपाल में 30 साल बाद भी नहीं बन पाई लोहा मंडी; 57 चिट्ठियां लिखने के बाद भी व्यापारियों को इंतजार, इंदौर-ग्वालियर-जबलपुर निकले आगे
भोपाल में 30 साल और 57 चिट्ठियों के बाद भी लोहा मंडी नहीं बन पाई है। इंदौर और जबलपुर जैसे शहर आगे निकल चुके हैं, जबकि भोपाल के व्यापारी संघर्ष कर रहे हैं।
भोपाल में लोहा मंडी की स्थापना को लेकर 30 साल की लंबी लड़ाई लड़ी जा चुकी है। इस दौरान सरकार को एक-दो नहीं बल्कि 57 से ज्यादा पत्र (चिट्ठियां) लिखी गईं। वर्ष 1995 से लेकर 2026 तक हर नए मास्टर प्लान में यह भरोसा जरूर दिलाया गया कि भोपाल में लोहा मंडी के लिए जमीन प्रस्तावित है, लेकिन तीन दशक बीत जाने के बाद भी भोपाल में लोहे का थोक बाजार जमीन पर नहीं उतर पाया है। इसके विपरीत, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे शहर व्यवस्थित लोहा मंडी के मामले में काफी आगे निकल चुके हैं। आखिर भोपाल का लोहा बाजार कहां और क्यों अटक गया, कौन सी प्रशासनिक अड़चनें आड़े आईं और व्यापारियों ने इस एक मांग के लिए कितना संघर्ष किया है, आइए जानते हैं पूरी विस्तृत रिपोर्ट।
🗺️ 3 दशक में बदल गया भोपाल का भूगोल, लेकिन नहीं मिली एक अदद लोहा मंडी की जगह
भूगोल और ट्रैफिक का संकट:
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व्यापारी और ग्राहकों की मुश्किलें: इन तीन दशकों में भोपाल का दायरा और भूगोल पूरी तरह बदल गया, लेकिन लोहा मंडी की मांग जस की तस बनी हुई है। वर्तमान में भोपाल के भारी ट्रैफिक दबाव वाले पुराने इलाकों जैसे जिंसी, सुभाष नगर और शहर के अन्य व्यस्ततम हिस्सों में लोहे का कारोबार फैला हुआ है।
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अड़चनें और सवाल: शहर के बीचों-बीच दुकानें होने के कारण न केवल व्यापारियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, बल्कि आम नागरिकों और ट्रैफिक व्यवस्था के सामने भी गंभीर संकट खड़ा रहता है। सवाल यह है कि जब बार-बार प्रस्ताव बने और व्यापारियों ने पूरी सहमति दी, तो यह योजना धरातल पर क्यों नहीं उतर पाई।
📋 मास्टर प्लान दर मास्टर प्लान: ऐसे खारिज और बदलते रहे लोहा मंडी के प्रस्ताव
भोपाल लोहा व्यवसाय एवं निर्माता संघ के अध्यक्ष बलदेव खेमानी 30 साल के इस संघर्ष का सिलसिलेवार ब्यौरा देते हैं:
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1995 का मास्टर प्लान: जब पहली बार मास्टर प्लान आया, तो जनसंख्या को देखते हुए बैरसिया और विदिशा के बीच भानपुर इलाके में 100 एकड़ भूमि लोहा मंडी के लिए प्रस्तावित की गई, लेकिन यह प्रस्ताव कभी जमीन पर नहीं आया।
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2010 का प्रस्ताव: इस साल लोहा मंडी को ट्रांसपोर्ट नगर में प्रस्तावित किया गया, जिसे बाद में रद्द कर दिया गया।
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2013 कासंसहासैया प्रोजेक्ट: संघ की मांग पर कान्हासैया में साढ़े 37 एकड़ जमीन अलॉट करने की बात उठी। संघ ने 100 एकड़ न मिलने पर भी इस पर सहमति जताई, लेकिन टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (T&CP) ने इसे कृषि भूमि बताकर निरस्त कर दिया।
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2031 और 2047 का मसौदा: भोपाल विकास योजना 2031 और हालिया 2047 के मास्टर प्लान में भी लोहा मंडी को यातायात नगर में स्थानांतरित करने का जिक्र है। संघ इस पर भी तैयार है, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है।
💼 जीआईएस में 125 करोड़ का निवेश और 10 हजार नौकरियों का ऑफर, फिर भी नतीजा सिफर
व्यापारियों की पहल और सरकार का रवैया:
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हर शर्त मानने को तैयार व्यापारी: अध्यक्ष बलदेव खेमानी का कहना है कि वे सरकार के हर प्रस्ताव के लिए तैयार हैं। सरकार जमीन दे, जो भी शासकीय मूल्य या प्रीमियम होगा, उसका भुगतान किया जाएगा। विकास कार्य व्यापारी खुद करने को तैयार हैं या बीडीए (BDA) के माध्यम से कराने पर भी आपत्ति नहीं है।
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ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट (GIS): भोपाल के लोहा व्यापारियों ने ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के दौरान सरकार को 125 करोड़ रुपए के इन्वेस्टमेंट का प्रस्ताव दिया था और साथ ही 10 हजार नई नौकरियां देने का भी वादा किया था, ताकि सरकार पर कोई अतिरिक्त बोझ न पड़े।
🚚 व्यापारियों का दर्द: नो एंट्री, ट्रैफिक जाम और धंधा छोड़कर दूसरे शहर जाने को मजबूर लोग
व्यापारिक परेशानियां और पलायन:
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समय और ट्रैफिक की पाबंदियां: लोहे का व्यापार सुबह 9 बजे से रात 8 बजे तक चलता है, लेकिन शहर में भारी वाहनों की 'नो एंट्री' होने के कारण बाहर से आने वाला माल समय पर दुकानों तक नहीं पहुँच पाता। दिनभर की भीड़भाड़ में गाड़ियां खाली करना असंभव हो जाता है।
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व्यापारी अमित अग्रवाल और हीरालाल खेमानी के अनुसार: दिन में गाड़ियां न लग पाने के कारण सारा काम रात में करना पड़ता है, जिससे ट्रैफिक जाम और आम जनता को भी भारी असुविधा होती है।
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कारोबार का पलायन: सुनवाई न होने के कारण अब कई पुराने व्यापारी या तो अपना धंधा बंद कर रहे हैं या फिर भोपाल छोड़कर रायपुर, इंदौर या जबलपुर में अपना कारोबार जमाने को मजबूर हो चुके हैं।
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