बड़वानी में अनूठी परंपरा; रानीपुरा के सांवलियाजी धाम में अन्नकूट महाप्रसादी और पंगत का आयोजन, उमड़े श्रद्धालु
बड़वानी के रानीपुरा स्थित प्राचीन सांवलियाजी धाम में अन्नकूट महाप्रसादी और पंगत का आयोजन किया गया। रियासतकाल से चली आ रही इस परंपरा में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए।
धार्मिक आस्था, सेवा, समर्पण और सामाजिक समरसता की अनूठी मिसाल मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के रानीपुरा स्थित प्राचीन श्री सांवलियाजी धाम में देखने को मिलती है। दीपावली के बाद कार्तिक माह में यहाँ प्रतिवर्ष भगवान श्री सांवलिया सेठ की अन्नकूट महाप्रसादी के अंतर्गत विशेष पंगत का भव्य आयोजन किया जाता है। इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के मंडफिया स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री सांवरिया सेठ धाम की तर्ज पर ही बड़वानी के रानीपुरा में भी पंगत बैठाई जाती है। करीब 100 वर्षों से अधिक समय से चली आ रही इस रियासतकाल की परंपरा में निमाड़, मालवा सहित प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर भगवान के दर्शन-पूजन करते हैं और अनुशासन के साथ महाप्रसादी ग्रहण करते हैं।
🏛️ 154 वर्ष पुराना है रानीपुरा का सांवलियाजी मंदिर; तीन समाजों द्वारा होता है महाप्रसादी का आयोजन
मंदिर का इतिहास और सामाजिक सहभागिता:
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मनोहरी प्रतिमा: रानीपुरा स्थित सांवलियाजी का यह मंदिर करीब 154 वर्ष पुराना है, जहाँ भगवान सांवलिया सेठ की श्याम वर्ण की बेहद मनोहारी प्रतिमा विराजित है। यहाँ पीढ़ियों से विभिन्न परिवारों द्वारा सेवा और पूजन की परंपरा निभाई जा रही है।
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समाज की सहभागिता: राजस्थान के मंडफिया धाम की तरह ही बड़वानी में भी सर्व ब्राह्मण समाज, दशोरा महाजन समाज एवं बीसा नीमा महाजन समाज द्वारा अलग-अलग दिनों में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ महाप्रसादी का आयोजन किया जाता है।
👨👩👧👦 प्रदीप-मीना कानूनगो परिवार ने की वर्ष 2026 की पहली पंगत की मेजबानी
मेजबानी और आमंत्रण की परंपरा:
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प्रथम पंगत का आयोजन: बड़वानी के श्री गौड़ मालवीय ब्राह्मण धर्मशाला में वर्ष 2026 के तहत पहली पंगत का आयोजन 1 नवंबर को शाम 7 बजे किया गया।
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परिवार का योगदान: श्री कुलदेवी जी एवं श्री सांवरिया सेठ की असीम कृपा से इस महाप्रसादी की मेजबानी खरगोन निवासी प्रदीप कानूनगो एवं मीना कानूनगो के परिवार द्वारा की गई। परिवार ने समाज जनों, रिश्तेदारों और इष्ट-मित्रों को सपरिवार आमंत्रित कर प्रसाद ग्रहण करने का आग्रह किया। इस दौरान समाज के नवयुवक मंडल की भी विशेष सहभागिता रही।
🍲 पारंपरिक प्रसादी और वर्षों की प्रतीक्षा: 'आओ, सांवलिया जी ने बुलाया है'
आस्था, स्वाद और अनुशासन के रंग:
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विशेष व्यंजन: इस महाप्रसादी की खास पहचान यहाँ परोसी जाने वाली पारंपरिक प्रसादी है, जिसमें गुड़ की मीठी थूली तथा चवला-भाजी के साथ मिश्रित सब्जियों का प्रसाद श्रद्धालुओं को बड़े प्रेम से परोसा जाता है। पंगत में एक साथ बैठकर प्रसादी पाना सामाजिक एकता का संदेश देता है।
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सावंत और प्रतीक्षा: इस आयोजन के प्रति समाज जनों में इतना उत्साह होता है कि कई परिवार अपनी बारी आने के लिए 7 से 8 वर्षों तक प्रतीक्षा करते हैं। यह इंतजार भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा का प्रतीक है। निमंत्रण देते समय बड़े आत्मीय भाव से कहा जाता है—'आओ, सांवलिया जी ने बुलाया है'।
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नई पीढ़ी का सहयोग: जाति और वर्ग की सीमाओं से ऊपर उठकर आयोजित होने वाली यह महाप्रसादी हजारों लोगों को आपस में जोड़ती है, जिसे आज की युवा पीढ़ी पूरी ऊर्जा और उत्साह के साथ आगे बढ़ा रही है।
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