पूर्वजों के स्मरण और हरित विरासत बचाने का संदेश; मुरैना में 1100 दीपों की रोशनी से जगमगाया पितृवन
मुरैना के पितृवन में छोटी दीपावली पर 1100 दीपों का भव्य दीपदान। धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत संगम। पूरी खबर पढ़ें।
मुरैना: चंबल की पावन धरती पर जब 1100 दीप एक साथ प्रज्ज्वलित हुए, तो प्रकृति का आंगन मानो किसी स्वर्ग की तरह जगमगा उठा। कहीं पीपल के नीचे आस्था का प्रकाश फैल रहा था, तो कहीं बरगद, बेलपत्र और अशोक के पवित्र वृक्षों के बीच सनातन संस्कृति की अनुपम छटा दिखाई दे रही थी। छोटी दीपावली (नरक चतुर्दशी) के अवसर पर मुरैना के नेशनल हाईवे-44 स्थित देवरी घड़ियाल केंद्र के पास स्थित पितृवन में कल्पवृक्ष सेवा समिति द्वारा एक अत्यंत भव्य दीपदान महोत्सव आयोजित किया गया, जिसने धार्मिक आस्था को पर्यावरण संरक्षण के साथ खूबसूरती से जोड़ दिया है। कार्यक्रम की शुरुआत मां तुलसी की पूजा-अर्चना और वंदन के साथ हुई, जिसके बाद 1100 दीप जलाकर पूर्वजों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
🪔 पेड़-पौधों की तलहटी में सजी 1100 दीपों की श्रृंखला; प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अनोखा अवसर
दीपदान और आयोजन का विवरण:
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वृक्षों के समीप प्रज्ज्वलन: तुलसी पूजन के बाद पीपल, बरगद, बेलपत्र, अशोक और कदम सहित विभिन्न पवित्र वृक्षों के समीप दीप प्रज्ज्वलित किए गए।
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अलौकिक नजारा: देखते ही देखते वृक्षों की तलहटी और पौधों के आसपास सजे 1100 दीपों ने पूरे पितृवन परिसर को अलौकिक रोशनी से नहला दिया।
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सामूहिक आरती: उपस्थित सभी लोगों ने मिलकर सामूहिक आरती की और प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए पूर्वजों को नमन किया।
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हरित संदेश: इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसे केवल एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसके माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित विरासत (Green Heritage) को बचाने का सशक्त संदेश भी दिया गया।
🤝 'धार्मिक पर्वों को प्रकृति संरक्षण से जोड़ना बेहद जरूरी'—कल्पवृक्ष सेवा समिति के अध्यक्ष के विचार
समिति का उद्देश्य और संदेश:
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संस्कार और पर्यावरण: कल्पवृक्ष सेवा समिति के अध्यक्ष अतुल माहेश्वरी ने बताया कि हमारे धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्व केवल कागजी या औपचारिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। इनके माध्यम से समाज में अच्छे संस्कार, सामाजिक एकता, सेवा की भावना और पर्यावरण संरक्षण का संदेश पहुंचना चाहिए।
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सकारात्मकता का पर्व: दीपावली और नरक चतुर्दशी मुख्य रूप से प्रकाश, आपसी सद्भाव और सकारात्मकता के प्रतीक हैं। पितृवन में दीपदान का मुख्य उद्देश्य पूर्वजों का स्मरण करने के साथ-साथ प्रकृति के प्रति अपने मौलिक दायित्वों को समझना भी है।
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सामूहिक चेतना: उन्होंने कहा कि एक अकेला दीप हमारे व्यक्तिगत जीवन में प्रकाश का प्रतीक बनता है, जबकि सैकड़ों दीपों का सामूहिक प्रज्ज्वलन समाज में एकता, आपसी सहयोग और सामूहिक चेतना को जागृत करता है। समिति भविष्य में भी ऐसे रचनात्मक आयोजन निरंतर जारी रखेगी।
🌱 पिछले 10 वर्षों से संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण की अलख जगा रही है कल्पवृक्ष सेवा समिति
समिति की कार्यशैली और उपलब्धियां:
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एक दशक का सफर: कल्पवृक्ष सेवा समिति पिछले 10 वर्षों से अधिक समय से मुरैना के पितृवन में धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरण संवर्धन से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम सफलतापूर्वक आयोजित करती आ रही है।
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संरक्षण की सोच: समिति का स्पष्ट मानना है कि केवल पौधे लगा देना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उनका लगातार पालन-पोषण और संरक्षण करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
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दीपावली की शुभकामनाएं: इसी सकारात्मक सोच के साथ आयोजित इस दीपदान महोत्सव में धार्मिक आस्था को सीधे प्रकृति प्रेम के साथ जोड़ा गया। 1100 दीपों की जगमगाहट के बीच पूर्वजों के सम्मान और हरित विरासत को संवारने का संदेश दिया गया। कार्यक्रम के अंत में सभी सदस्यों ने एक-दूसरे को दीपावली की आत्मीय शुभकामनाएं दीं और समाज तथा पर्यावरण के उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना की।
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