नाबालिगों द्वारा पॉर्न देखने पर लगे रोक; सुप्रीम कोर्ट का अहम आदेश— नीति के लिए सरकार को सौंपे प्रतिवेदन
नाबालिगों द्वारा पॉर्नोग्राफी देखने पर रोक लगाने की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को केंद्र सरकार के समक्ष पक्ष रखने की छूट दी है।
व्यक्तियो के साथ-साथ समाज विशेष रूप से विकासशील मस्तिष्कों 13 से 18 वर्ष की आयु के युवाओ द्वारा पोर्न वीडियो देखने से उनके मानस पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ता है। इस वजह से हमारे देश की संस्कृति नष्ट हो रही है। इस मुद्दे को लेकर केन्द्र सरकार से एक राष्ट्रीय निती बनाने और पोर्नोग्राफी (खासकर नाबालिगो द्वारा) देखने पर रोक लगाने के लिए एक कार्य योजना तैयार करने के निर्देश जारी करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट मे सेंधवा के सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता बी.एल. जैन द्वारा एक जनहित याचिका दायर की गई थी।
जिस पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका की सुनवाई पश्चात् चीफ जस्टिस सुर्यकांत एवं जस्टिस जाॅयमाल्य बागची एवं जस्टिस वी.मोहना की बेंच ने कहा कि हमने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता वरूण ठाकुर की दलीले सुनी। "रिट याचिका मे उठाया गया मुद्दा निसंदेह बहुत ज्यादा सार्वजनिक महत्व का है," हालांकि यह मुद्दा कानुन का ऐसा सवाल नही है जिसका फैसला इस कोर्ट को करना हो, असल मे यह मामला मुख्य रूप से तकनीकी तरक्की के इस्तेमाल पर आधारित एक पाॅलिसी से जुड़ा हुआ है। ऐसे मामले आमतौर पर विशेषज्ञों और अधिकारियों खासकर सुचना और प्रसारण मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र मे आते है। नतीजन मामले के गुण दोष पर कोई राय जाहिर किए बिना हम याचिकाकर्ता को यह लिबर्टी (छुट) देते हुए याचिका का निराकरण करते है कि वह संबंधित अधिकारियों को अपनी ओर से रीट याचिका की एक प्रति एक अभ्यावेदन के साथ भेज सके। सुप्रीम कोर्ट ने अपने लिखित आदेश मे स्पष्ट तौर पर लिखा है कि हम संबंधित अधिकारियो से आग्रह करते है कि वे याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुद्दो या उनके द्वारा दिए गए सुझावो पर विचार करें। हमे इसमे कोई संदेह नही है कि अधिकारी ऐसे सुझावो पर उचित विचार करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि यूरोप, आस्ट्रेलिया, चीन और अरब सहित अनेक देशों ने चाईल्ड पोर्नोग्राफी पर पुर्णतः प्रतिबंध लगा दिया है लेकिन भारत में इस पर प्रतिबंध नहीं होने से पोर्न वीडियो की साईटे भारतीय बाजार में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध है आपने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता द्वारा विभिन्न स्त्रोतो से जो जानकारी एकत्रित की गई है वह चैकाने वाली है जिसके अनुसार वैश्विक स्तर पर हर सेकण्ड 5 हजार पोर्न साईटे एक्सेस की जाती है। सन् 2005 से प्रतिवर्ष 2 करोड़ से अधिक पोर्न वीडियो लांच किये जाते है प्रतिवर्ष इंटरनेट या चाईल्ड पोर्न वीडियो के जरिये 20 करोड़ से अधिक वीडियो लान्च किये जाते है। जिस पर अश्लील वीडियो/ अश्लील क्लिपींग जिसमें बाल पोर्नोग्राफी भी शामिल है जो कि भारतीय बाजार में खुलेआम उपलब्ध है। कोर्ट को बताया गया कि कोविड महामारी के बाद डिजिटल पहुंच पर अधिक जोर दिया गया परिणाम स्वरूप बच्चे मोबाईल का उपयोग अधिक से अधिक कर रहे है क्योंकि बाल पोर्नोग्राफी एक क्लिक में आसानी से उपलब्ध होती है।
पोर्नोग्राफी का अत्यधिक इस्तेमाल लत और मानसिक परेशानी का कारण बनता है। बाल मन पर आ रही इस विकृती के कारण हमारी संस्कृति पथभ्रष्ट होती जा रही है यही नहीं उम्रदराज व्यक्ति भी इसके आदि बन चुके है परिणाम महिलाओं/युवतियो के खिलाफ होने वाले अधिकांश अपराध तथा लडकियो के साथ सामुहिक बलात्कार और यौन उत्पीड़न जैसे जो अपराध हो रहे है निश्चित ही इसमें पोनोग्राफी वीडियो का बड़ा हिस्सा है इसी के परिणामस्वरूप परिवारो में आपसी मनमुटाव, तनाव, रिश्तों के टुटने की संख्या जहां बढ़ रही है वहीं आत्म हत्याओं के मामले भी इन्हीं विकृतियों के कारण बढ़ रहे है जो सम्पुर्ण समाज के लिये गम्भीर चिंता का विषय बना हुआ है।
याचिका में 1 जनवरी 1862 से अभी तक के कानुनी प्रावधानो की जानकारी देते हुवे कोर्ट को बताया गया कि सुचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए के तहत केन्द्र सरकार को कम्प्युटर संसाधनो के माध्यम से किसी भी अश्लील साम्रगी को सार्वजनिक पहुंच से अवरूद्ध करने का अधिकार देती है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि नाबालिगो को नुकसान पहुंचाने के दस्तावेज के बावजुद केन्द्र सरकार इन शक्तियों को प्रयोग करने में विफल रहा है। ऐसी स्थिति मे केन्द्र सरकार को आवश्यक निर्देश देने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पश्चात् याचिकाकर्ता बी.एल. जैन द्वारा देश की सर्वोच्च अदालत के आदेश पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए केन्द्र सरकार के समक्ष अपना अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की बात कही है।
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