अमेरिकी मशीनें टूटीं, जर्मन तकनीक से हुआ कमाल; जानें 1610 करोड़ की स्लीमनाबाद टनल की पूरी संघर्ष गाथा

कटनी के स्लीमनाबाद में देश की सबसे अनोखी 11.952 किमी लंबी वाटर टनल तैयार। बिना बिजली ग्रेविटी से बहेगा नर्मदा जल, 1450 गांवों को मिलेगी संजीवनी।

Jul 17, 2026 - 17:39
Updated: 8 days ago
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अमेरिकी मशीनें टूटीं, जर्मन तकनीक से हुआ कमाल; जानें 1610 करोड़ की स्लीमनाबाद टनल की पूरी संघर्ष गाथा

भोपाल। मध्य प्रदेश की स्लीमनाबाद टनल लगभग बनकर तैयार है. यह टनल अपने आप में आधुनिक इंजीनियरिंग का एक अनोखा अजूबा है. भारत के इतिहास में यह अपनी तरह का पहला और सबसे बेजोड़ तकनीकी कमाल है. इस टनल के आकार लेने की कहानी के पीछे उन अंधेरी रातों, गहरे सन्नाटों और जानलेवा मुश्किलों को जानना भी बेहद जरूरी है, जिनसे हमारे जांबाज इंजीनियर्स हर मिनट जूझते रहे. विंध्य पर्वतमाला की 40 मीटर ऊंची रिज लाइन (Ridge Line) को भेदने का यह असंभव काम जमीन से करीब 30 से 120 फीट नीचे अंजाम दिया गया है. टनल के भीतर हर मिनट 25 हजार लीटर तक उफनता पानी और लगातार धंसती मिट्टी की भारी चुनौती थी. लेकिन दृढ़ संकल्प के आगे मुश्किलें छोटी पड़ गईं और अब यह टनल विंध्य-महाकौशल के 1450 गांवों की 2.45 लाख हेक्टेयर सूखी जमीन को लहलहाकर क्षेत्र की तस्वीर हमेशा के लिए बदल देगी.

यह ऐतिहासिक जल सुरंग कटनी, रीवा, मैहर और सतना सहित 5 प्रमुख जिलों के लिए जीवनदायिनी अमृतधारा साबित होने वाली है. प्राकृतिक रूप से नर्मदा नदी मध्य प्रदेश से बहकर गुजरात के खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में जाकर मिलती है, लेकिन यह विज्ञान और आधुनिक इंजीनियरिंग का अनूठा चमत्कार ही है कि अब मां नर्मदा इस ऐतिहासिक टनल के माध्यम से गंगा बेसिन की सोन नदी के आसपास के सूखे अंचलों में भी हरियाली लाएगी.

वरदान साबित होगी परियोजना:

किसानों और क्षेत्रीय व्यापारियों के लिए यह टनल किसी वरदान से कम नहीं है. लगभग 12 किलोमीटर लंबी यह टनल भविष्य में देश-दुनिया के इंजीनियरिंग छात्रों के लिए एक बेहतरीन केस स्टडी बनेगी. इसकी मजबूती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भीषण से भीषण भूकंप आने पर भी यह टनल अगले 100 साल तक पूरी तरह सुरक्षित रहेगी.

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने टनल परियोजना के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त किया. उन्होंने बताया कि इस परियोजना के लिए ₹1600 करोड़ की बड़ी राशि केंद्र सरकार द्वारा और लगभग ₹275 करोड़ की राशि राज्य सरकार द्वारा प्रदान की गई है.

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने टनल निर्माण के रोमांचक सफर को साझा करते हुए बताया कि इस सुरंग को आकार देने के लिए मजदूर और इंजीनियर 8-8 घंटे की तीन शिफ्टों में दिन-रात पसीना बहाते थे. वर्ष 2015 तक केवल 1406 मीटर टनल की ही बोरिंग हो पाई थी, जिसके बाद इसकी गति बढ़ाना बेहद जरूरी था. साल 2016 से टनल के अपस्ट्रीम छोर से खुदाई करने के लिए जर्मनी से विशेष अत्याधुनिक मशीन मंगवाई गई.

जैसे-जैसे खुदाई आगे बढ़ी, इंजीनियरों, तकनीशियनों और मजदूरों के सामने सुरक्षा मानकों को बनाए रखते हुए काम करना एक बड़ी चुनौती बनता चला गया. साल 2023 में जब राज्य में नई सरकार बनी, तो कुछ तकनीकी जटिलताओं के कारण ठेकेदार ने काम करने से हाथ खड़े कर दिए थे. मशीनें पुरानी हो चुकी थीं और केवल एक ही मशीन से जैसे-तैसे काम जारी रखा गया था. मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया कि एक समय ऐसा भी आया था जब लगा कि इस टनल का पूरा होना नामुमकिन है, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति से यह कठिन राह आसान हो गई.

तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, विंध्य की 40 मीटर ऊंची बेहद कठोर रिज लाइन को काटना लगभग असंभव माना जा रहा था. जमीन के नीचे काम कर रहे इंजीनियरों के सामने तब सबसे बड़ा संकट खड़ा हुआ, जब उनका सामना मार्बल, लाइमस्टोन, डोलोमाइट और पानी में घुली चूने की विशालकाय भूमिगत गुफाओं से हुआ.

  • पानी का रौद्र रूप: टनल के भीतर प्रति मिनट 25 हजार लीटर की रफ्तार से पानी का रिसाव होने लगा और वहाँ की मिट्टी के धंसने की प्रवृत्ति (Squeezing Ground) ने काम को बेहद खतरनाक बना दिया.

  • मशीनों का फेल होना: इस भीषण दबाव के कारण काम पर लगाई गई भारी-भरकम अमेरिकी मशीन भी टूट गई.

  • जर्मन तकनीक का सहारा: इसके बाद विशेष तौर पर अत्याधुनिक जर्मन 'हेरेनकनेक्ट' (Herrenknecht) मशीन को काम पर उतारा गया और पानी रोकने के लिए आधुनिक 'टेम ग्राउटिंग' (TAM Grouting) तकनीक का इस्तेमाल किया गया. हमारी टीम ने इस टनल को इतनी कुशलता से तैयार किया कि ऊपर घनी आबादी, नेशनल हाईवे और व्यस्त रेलवे ट्रैक होने के बावजूद धरातल पर किसी को एक खरोंच तक नहीं आई.

इस टनल की कुल लंबाई 11.952 किलोमीटर है, जिसका व्यास (Diameter) 10.14 मीटर है. यह बिना किसी बिजली या भारी पंपिंग सिस्टम के, पूर्णतः प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण (Gravity) के सिद्धांत पर पानी को आगे बढ़ाएगी. इस टनल के सक्रिय होते ही इसके कमांड क्षेत्र के तहत आने वाले जिलों को मिलने वाला पानी का लाभ इस प्रकार होगा:

  • सतना जिला: 1 लाख 4 हजार 970 हेक्टेयर सूखी भूमि सिंचित होगी.

  • मैहर जिला: 54 हजार 227 हेक्टेयर क्षेत्र को नया जीवन मिलेगा.

  • कटनी जिला: 21 हजार 823 हेक्टेयर कृषि भूमि लहलहाएगी.

  • रीवा जिला: 3 हजार 532 हेक्टेयर क्षेत्र हरा-भरा होगा.

  • पन्ना जिला: 448 हेक्टेयर क्षेत्र में पानी पहुंचेगा.

इस जटिल टनल के निर्माण का जिम्मा हैदराबाद की प्रतिष्ठित निर्माण एजेंसी मेसर्स पटेल-एसईडब्ल्यू (संयुक्त उपक्रम) को सौंपा गया था. इसके अनुबंध (Contract) की पूरी वित्तीय और भौतिक प्रगति इस प्रकार है:

विवरण (Sleemanabad Tunnel Project) आंकड़े व विवरण
अनुबंध (Contract) वर्ष 2008
शुरुआती अनुमानित लागत ₹799 करोड़
अब तक कुल खर्च (वर्ष 2026) ₹1610.47 करोड़
भौतिक कार्य की प्रगति 96.66% पूर्ण
मुख्य टनल व ओपन कट नहर (12.135 किमी) 100% पूर्ण

भूगर्भीय चुनौतियों और आधुनिक तकनीकों (जैसे विशेष जर्मन मशीनों व ग्राउटिंग) के आयात के चलते समय के साथ इस बड़े प्रोजेक्ट की बजट लागत में वृद्धि हुई, जिसे राज्य व केंद्र सरकार ने आपसी तालमेल से पूरा किया.

मार्च 2026 तक की स्थिति में 44 हजार 160 हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई क्षमता को धरातल पर उतार दिया गया है, जिससे हजारों किसान सीधे तौर पर लाभान्वित हो रहे हैं. मध्य प्रदेश सरकार के तैयार किए गए आधिकारिक रोडमैप के अनुसार, आगामी लक्ष्यों को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा:

  • दिसंबर 2026 तक का लक्ष्य: 87 हजार 433 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी.

  • दिसंबर 2027 तक का लक्ष्य: कुल 1 लाख 54 हजार 693 हेक्टेयर क्षेत्र में पानी पहुंचाया जाएगा.

इस प्रकार, निर्धारित समय सीमा के भीतर कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना जिलों की कुल 1.85 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को पूर्णतः सिंचित करने का महालक्ष्य शत-प्रतिशत पूरा कर लिया जाएगा.

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