शेयर बाजार में हाहाकार! सेंसेक्स 800 अंक टूटा, निवेशकों के डूब गए ₹4.66 लाख करोड़
ईरान-अमेरिका तनाव, कच्चे तेल में उछाल और ट्रंप की टैरिफ नीति से भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई। सेंसेक्स 800 अंक टूटकर 77,384 पर आ गया। जानिए शेयर बाजार में तबाही की 6 बड़ी वजहें।
बुधवार को भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई. ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते कूटनीतिक व सैन्य तनाव, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से टैरिफ (आयात शुल्क) बढ़ाने की नई धमकियों और वैश्विक अनिश्चितता के कारण निवेशकों में भारी घबराहट फैल गई. इससे सेंसेक्स और निफ्टी में करीब 1 फीसदी की गिरावट आई और लगातार गिरने का सिलसिला जारी रहा.
बीएसई सेंसेक्स (BSE Sensex) 800 अंक से ज्यादा टूटकर दिन के निचले स्तर 77,384 पर आ गया, जबकि एनएसई निफ्टी 50 (NSE Nifty 50) में 200 अंक से ज्यादा की गिरावट हुई और यह 24,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे चला गया. इस चौतरफा बिकवाली के कारण बीएसई पर सूचीबद्ध सभी कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण (Market Capitalization) लगभग 4.66 लाख करोड़ रुपये घटकर 4.79 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा आयातित जेनेरिक दवाओं पर चरणबद्ध टैरिफ योजना की घोषणा के बाद फार्मा शेयरों में सबसे ज़्यादा गिरावट देखी गई. सेंसेक्स में सबसे ज़्यादा गिरावट इंडिगो (IndiGo) के शेयरों में हुई, जो 3 फीसदी से ज़्यादा गिरे, जबकि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के शेयरों में लगभग 2 फीसदी की गिरावट आई. इसके अलावा इंफोसिस, एक्सिस बैंक, ICICI बैंक, अल्ट्राटेक सीमेंट, रिलायंस इंडस्ट्रीज, HDFC बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, सन फार्मा और टेक महिंद्रा के शेयरों में 1 फीसदी से ज़्यादा की गिरावट दर्ज की गई. वहीं इसके उलट टाइटन, मारुति सुजुकी और एटरनल (Eternal) के शेयर मामूली बढ़त के साथ हरे निशान में बंद हुए.
ब्रॉडर मार्केट में भी भारी बिकवाली रही. निफ्टी स्मॉलकैप 100 और निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स में से प्रत्येक में लगभग 1 फीसदी की गिरावट आई. एनएसई (NSE) पर 2,165 शेयरों में गिरावट और 802 शेयरों में बढ़त देखी गई, जबकि 82 शेयर बिना किसी बदलाव के बंद हुए. बाजार में उतार-चढ़ाव और अनिश्चितता को मापने वाला इंडिया विक्स (India VIX) 4 फीसदी से ज्यादा उछलकर 13.14 पर पहुंच गया.
मंगलवार को सऊदी अरब से एशिया जा रहे तीन तेल टैंकरों ने लाल सागर (Red Sea) में अपना रास्ता बदल लिया. यह कदम यमन के ईरान-समर्थक हूथी विद्रोहियों की धमकियों के बाद उठाया गया. मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव की वजह से दुनिया के दो सबसे अहम एनर्जी चोकपॉइंट्स (ऊर्जा आपूर्ति के मुख्य रास्ते) से होने वाली शिपिंग में रुकावट आई है. ईरान पहले ही होर्मुज की खाड़ी से होने वाली शिपिंग को रोकने की धमकी दे चुका है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिका बातचीत को तैयार है, लेकिन ईरान इसके प्रति गंभीर नहीं है.
सप्लाई में नई रुकावटों की आशंका के चलते बुधवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें दो महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं. ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) 92 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर ट्रेड कर रहा था, जबकि WTI क्रूड 85 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया. 'गोल्डमैन सैक्स' ने अपनी हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि यदि होर्मुज की खाड़ी से आपूर्ति बाधित रहती है, तो ब्रेंट क्रूड की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आयातित जेनेरिक दवाओं के लिए चरणबद्ध टैरिफ योजना की घोषणा की. इसके तहत 1 अगस्त से दो साल तक अमेरिका में आने वाली जेनेरिक दवाओं पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा. इसके बाद, एक साल तक 100% और फिर 200% लेवी (शुल्क) लगाई जाएगी. इस फैसले के बाद फार्मा शेयरों में भारी हड़कंप मच गया. ल्यूपिन, पिरामल फार्मा, ग्लेनमार्क और सिप्ला में 4% तक की गिरावट आई, जिससे निफ्टी फार्मा इंडेक्स लगभग 2% नीचे आ गया.
रॉयटर्स के पोल के मुताबिक, US फेडरल रिजर्व 2026 के बाकी समय के लिए अपनी मुख्य ब्याज दर को स्थिर रख सकता है, लेकिन दरें बढ़ाए जाने की संभावना को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं. प्रेडिक्शन मार्केट प्लेटफॉर्म 'पॉलीमार्केट' और CME ग्रुप के 'फेडवॉच' पर अब दरें बढ़ाए जाने की 27 फीसदी संभावना जताई जा रही है, जिससे वैश्विक इक्विटी बाजारों पर दबाव बढ़ गया है.
बुधवार को भारतीय रुपया दबाव में आ गया और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 11 पैसे गिरकर 96.36 पर खुला. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भारत के इंपोर्ट बिल और महंगाई दर को लेकर चिंता बढ़ा दी है. कमोडिटी विशेषज्ञों के अनुसार, तकनीकी रूप से निकट भविष्य में रुपये के 96.00 से 96.45 के दायरे में कारोबार करने की उम्मीद है. अब बाजार की नजरें 29 जुलाई को आने वाले US फेडरल रिजर्व के पॉलिसी फैसले पर टिकी हैं.
अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 4.63 फीसदी हो गई, जबकि 30-वर्षीय बॉन्ड की यील्ड बढ़कर 5.137 फीसदी पहुंच गई. बॉन्ड यील्ड बढ़ने से निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकालकर बॉन्ड में लगाने लगते हैं. इसके अलावा, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने पिछले छह में से पांच सत्रों में दलाल स्ट्रीट पर नेट सेलिंग की है और ₹6,000 करोड़ से ज्यादा के भारतीय शेयर बेचे हैं, जिससे बाजार पर चौतरफा दबाव बना हुआ है.
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