कारगिल शहीद के परिजनों का दर्द, सरकार द्वारा की गई घोषणाएं आज तक नहीं हुईं पूरी

कारगिल युद्ध के 27 साल बाद भी सीधी जिले के शहीद बृजभूषण तिवारी के परिवार को शासन द्वारा किए गए वादों का इंतजार है। गैस एजेंसी और फ्लैट देने की घोषणाएं आज भी अधूरी हैं।

Jul 27, 2026 - 14:26
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कारगिल शहीद के परिजनों का दर्द, सरकार द्वारा की गई घोषणाएं आज तक नहीं हुईं पूरी

सीधी: जब-जब कारगिल युद्ध का नाम जुबां पर आता है, तब-तब हर एक हिंदुस्तानी का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। न केवल युद्ध बल्कि इस महासंग्राम में देश के लिए शहीद हुए हर एक जांबाज सैनिक की वीर गाथाएं और यादें आज भी देशवासियों के दिलों में पूरी तरह ताजा हैं। लेकिन इस ऐतिहासिक युद्ध के पूरे 27 साल बीत जाने के बाद भी सीधी जिले के लकोड़ा गांव के बलिदानी स्वर्गीय बृजभूषण तिवारी को वह सम्मान, अधिकार और सरकारी हक हासिल नहीं हो सका है, जिसके वे वास्तव में हकदार थे। सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था की यही उदासीनता और बेरुखी इस जांबाज सिपाही के परिवार और उनसे जुड़े हर शख्स के मन में एक गहरी टीस बनकर चुभ रही है।

📜 गैस एजेंसी, फ्लैट और जमीन देने के किए गए थे बड़े वादे

आपको बता दें कि स्वर्गीय बृजभूषण तिवारी के देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दे जाने के बाद शासन-प्रशासन की तरफ से परिवार को कई बड़ी घोषणाएं और आश्वासन दिए गए थे, जो आज भी कागजों तक ही सीमित होकर रह गए हैं। बलिदानी के पुत्र ने दर्द साझा करते हुए बताया कि शासन द्वारा परिवार को पेट्रोल पंप, गैस एजेंसी, राजधानी दिल्ली में फ्लैट और जिला मुख्यालय पर मकान बनाने के लिए जमीन देने का वादा किया गया था। इनमें से आज तक एक भी वादा सरकार द्वारा पूरा नहीं किया गया है, जिससे पूरा परिवार बेहद व्यथित और आहत है।

🇮🇳 ''वे पीठ दिखाकर नहीं लौटे, बल्कि तिरंगे में लिपटकर आए''

प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिले के लकोड़ा गांव में जन्मे बृजभूषण तिवारी के मन में देश सेवा का गहरा जज्बा था और इसी जुनून के साथ वे भारतीय सेना में बतौर सिपाही भर्ती हुए थे। हालांकि, जब वे देश के लिए शहीद हुए, उस समय वे हवलदार के पद पर सेवारत थे। बलिदानी बृजभूषण तिवारी की धर्मपत्नी रामकली तिवारी नम आंखों से बताती हैं कि, ''जब कारगिल युद्ध के दौरान उनकी ड्यूटी लगी थी, तब अक्सर रात में फोन पर बातचीत होती थी। वे हमेशा कहते थे कि मैं मैदान में कभी पीठ दिखाकर नहीं लौटूंगा, पाकिस्तानी सेना को पूरी तरह पछाड़कर ही वापस आऊंगा। और अंत में वाकई वे हारकर नहीं लौटे, बल्कि देश के आन-बान-शान तिरंगे में लिपटकर उनका पार्थिव शरीर घर आया था।''

💣 पाकिस्तानी सेना के बम हमले में हो गए थे वीरगति को प्राप्त

बृजभूषण तिवारी ने 5 जनवरी 1979 को भारतीय सेना की वर्दी पहनी थी और अपनी उत्कृष्ट सेवा के दौरान उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी नवाजा गया था। अंत में, पाकिस्तान के खिलाफ ऐतिहासिक कारगिल युद्ध के मैदान में डटकर मोर्चा संभालते हुए 8 जुलाई 1999 को वे वीरगति को प्राप्त हो गए। परिजनों ने बताया कि जब वे युद्ध के मैदान में डटे हुए थे, तब पाकिस्तानी सेना ने अचानक भारी बमबारी कर दी। इसी बम हमले की चपेट में आने से वे गंभीर रूप से घायल हो गए और देश के लिए कुर्बान हो गए।

💪 कठिनाइयों और गरीबी का सामना कर पत्नी ने पाले बच्चे

बलिदानी बृजभूषण तिवारी अपने पीछे तीन मासूम बच्चों को छोड़ गए थे। जिस समय उन्होंने देश के लिए बलिदान दिया, उस दौरान उनके बच्चों की उम्र महज तीन से चार वर्ष के बीच की थी। उनके अचानक निधन से पूरा परिवार बुरी तरह बिखर गया था और घर में आय का कोई भी अन्य साधन नहीं बचा था। ऐसे विकट समय में उनकी पत्नी रामकली तिवारी ने हार नहीं मानी और लोगों के घरों में मजदूरी करके अपने तीनों बच्चों का पालन-पोषण किया। आज संघर्षों भरे उस दौर के बाद उनके तीनों बेटों में से सबसे छोटा बेटा सामाजिक न्याय विभाग में अपनी सेवाएं दे रहा है, जबकि अन्य दो भाई दिल्ली और मुंबई में रहकर अपनी आजीविका चला रहे हैं।

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