जबलपुर जेल में बना है एक साथ 3 लोगों को फांसी देने का तख्ता, जानिए टंट्या भील से जुड़े इतिहास के पन्ने
मध्य प्रदेश में फांसी की सजा देने की सुविधा केवल जबलपुर सेंट्रल जेल में है। यहाँ पिछले 30 सालों में किसी को फांसी नहीं दी गई है, लेकिन अभी भी 5 कैदी मौत की सजा काट रहे हैं।
जबलपुर: कानूनी तौर पर फांसी की सजा अब भले ही बीते दिनों की बात मानी जाती हो और यह दुर्लभ से दुर्लभ मामलों में ही दी जाती है, लेकिन देश की अदालतें आज भी गंभीर और जघन्य अपराधियों के लिए मौत की सजा (फांसी की सजा) सुनाती हैं। हालांकि, मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक जबलपुर सेंट्रल जेल में बीते 30 सालों से किसी भी कैदी को फांसी पर नहीं चढ़ाया गया है, लेकिन इसके बावजूद वर्तमान में इस जेल में फांसी की सजा पाने वाले 5 कुख्यात कैदी बंद हैं। जबलपुर सेंट्रल जेल के पूरे इतिहास पर नजर डालें तो अब तक यहां कुल 233 लोगों को फांसी दी जा चुकी है। इनमें से जहां एक तरफ कई खतरनाक अपराधी थे, वहीं दूसरी तरफ देश के कई महान स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी भी शामिल हैं जिन्हें अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान इसी जेल में फांसी के फंदे पर लटकाया गया था। आज भी पूरे मध्य प्रदेश राज्य में किसी भी अपराधी को फांसी देने की एकमात्र कानूनी सुविधा केवल जबलपुर सेंट्रल जेल में ही उपलब्ध है।
🏛️ जबलपुर जेल में साल 1996 में दी गई थी आखिरी बार फांसी
जबलपुर सेंट्रल जेल के अधिकारी मदन कमलेश इस बारे में जानकारी देते हुए बताते हैं कि, ''मध्य प्रदेश की सीमाओं के भीतर किसी भी जघन्य और गंभीर अपराधी को फांसी पर लटकाने की एकमात्र व्यवस्था सिर्फ जबलपुर सेंट्रल जेल में ही मौजूद है।''
इस जेल में आज भी एक ऐसा ऐतिहासिक और मजबूत फांसी का तख्ता बना हुआ है, जिस पर एक ही समय में एक साथ 3 कैदियों को फांसी दी जा सकती है। हालांकि, जबलपुर जेल में दी गई आखिरी (अंतिम) फांसी साल 1996 में हुई थी, जब शहडोल जिले के एक बलात्कार के दोषी आरोपी कामता प्रसाद तिवारी को अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाई गई थी और उसे इसी जेल में फांसी पर लटकाया गया था।
⛓️ अभी भी जबलपुर जेल में बंद हैं फांसी की सजा पाए 5 कैदी
अन्याय और अपराध के मामलों में देश की अदालतें भले ही दोषियों को फांसी की सजा सुना देती हैं, लेकिन लंबी कानूनी प्रक्रियाओं, अपीलों और दया याचिकाओं के चलते अपराधियों को तुरंत फांसी दी नहीं जाती है। वर्तमान समय में भी जबलपुर सेंट्रल जेल के सुरक्षा घेरे में फांसी की सजा पाए कुल 5 कैदी बंद हैं।
इन सभी कैदियों को निचली और सत्र अदालतों द्वारा मौत की सजा सुनाई जा चुकी है, लेकिन इनकी अपीलें देश की अलग-अलग उच्च और सर्वोच्च अदालतों में लंबित होने के कारण इन्हें अभी तक फांसी पर नहीं चढ़ाया गया है:
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विनोद उर्फ राहुल चौहथा: इस आरोपी के ऊपर हत्या और बलात्कार जैसे बेहद गंभीर आरोप दर्ज हैं। इसे शहडोल जिला अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाई गई थी। साल 2018 से यह कानूनी मामला अब तक लंबित है और फिलहाल इसकी विशेष अपील सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग चल रही है।
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महेंद्र सिंह गौंड: इस दोषी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 363 के तहत साल 2018 में अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी, जिसकी अपील भी वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
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रामनारायण उर्फ भानु बर्मन: इसे शहडोल जिले के बुढ़ार इलाके में पास्को एक्ट (POCSO) और हत्या के एक सनसनीखेज मामले में इसी साल फरवरी महीने में अदालत द्वारा फांसी की सजा दी गई है। इसका मामला भी सुप्रीम कोर्ट में ही पेंडिंग है।
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हरीश सोनी: यह कैदी मूल रूप से मंडला जिले का रहने वाला है और इसे कानून की धारा 302 व 307 के तहत अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। फिलहाल इसकी भी कानूनी अपील पेंडिंग स्थिति में है।
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रामजी भूमिया: यह आरोपी जबलपुर के ही बरगी नगर का रहने वाला है, जिसे स्थानीय जिला अदालत ने फांसी की सजा सुनाई है। इसने भी अपनी सजा के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील की हुई है।
🔪 पत्नी और सौतेली बेटी की बेरहमी से की थी हत्या
फांसी की सजा पाए कैदियों में शामिल रामजी भूमिया का यह पूरा मामला सीधे तौर पर जबलपुर शहर से ही जुड़ा हुआ है। इस हाई-प्रोफाइल मामले की जानकारी देते हुए जबलपुर के एडिशनल एसपी सूर्यकांत शर्मा ने बताया कि, ''आरोपी रामजी भूमिया ने अपनी ही पत्नी और अपनी मासूम सौतेली बेटी की एक धारदार हथियार से ताबड़तोड़ वार कर निर्मम हत्या कर दी थी।''
रामजी भूमिया पेशे से खुद एक कसाई था और मांस बेचने का काम किया करता था। किसी बात को लेकर उसका अपनी पत्नी के साथ घरेलू विवाद हुआ था, जिसके बाद उसने गुस्से में आकर अपनी पत्नी और सौतेली बेटी को मौत के घाट उतार दिया था।
📜 स्वतंत्रता के बाद से अब तक करीब 45 लोगों को दी जा चुकी है फांसी
जबलपुर जेल के रिकॉर्ड के अनुसार, साल 2013 में मगनलाल नाम के एक मौत की सजा पाए कैदी को फांसी पर लटकाने की पूरी तैयारी कर ली गई थी, लेकिन ठीक अंतिम वक्त में देश के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने उसकी फांसी की सजा पर रोक लगा दी थी।
उस दौर के जबलपुर जेल अधीक्षक एस.एस. सेगर ने मीडिया को आधिकारिक रूप से बताया था कि यदि उस समय मगनलाल को फांसी दे दी जाती, तो वह जबलपुर जेल की इतिहास की 234वीं फांसी होती। वहीं, देश के स्वतंत्र होने के बाद से लेकर अब तक केवल जबलपुर जेल में लगभग 45 अपराधियों और दोषियों को फांसी के फंदे पर चढ़ाया जा चुका है।
🔍 जबलपुर जेल के फांसी से जुड़े कुछ ऐतिहासिक और रोचक तथ्य
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स्वतंत्र भारत की पहली फांसी: देश को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के कुछ ही हफ्तों बाद, 9 सितंबर 1947 को रघुनाथ सिंह नामक एक कैदी को जबलपुर सेंट्रल जेल में स्वतंत्र भारत की पहली फांसी दी गई थी।
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आदिवासियों के महानायक टंट्या भील को फांसी: भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा प्रकाशित और जारी की गई पुस्तक 'भारत के शहीद' में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि महान आदिवासियों के महानायक टंट्या भील को अंग्रेजों ने क्रूरतापूर्वक 4 दिसंबर 1889 को इसी जबलपुर सेंट्रल जेल में फांसी पर लटकाया था।
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स्वतंत्रता संग्राम के अमर क्रांतिकारियों की शहादत: वर्ष 1897 की ऐतिहासिक क्रांति के दौरान सुहागपुर के विभूति सिंह को अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने के झूठे और कड़े जुर्म में साल 1862 में जबलपुर में ही फांसी के फंदे पर लटकाया गया था। इस जेल के भीतर अंग्रेजों के समय कई क्रांतिकारी कैद रहे थे, जिनमें से कई को भारी शारीरिक प्रताड़ना देकर जेल के अंदर ही मार डाला गया था।
जबलपुर सेंट्रल जेल प्रशासन के पास आज की तारीख में अब तक हुई सभी फांसियों का पूरा और मुकम्मल रिकॉर्ड सुरक्षित नहीं बचा है। जेल अधिकारियों का कहना है कि प्रशासनिक नियमों के तहत समय-समय पर बहुत पुराने दस्तावेजों और रिकॉर्ड्स को नष्ट कर दिया जाता है। इसका मतलब यह है कि जबलपुर जेल में देश की आजादी से पहले जिन 150 से अधिक लोगों को फांसी दी गई थी, उनमें कुछ शातिर अपराधी भी शामिल रहे होंगे, लेकिन उनमें से एक बहुत बड़ी संख्या उन महान और अमर स्वतंत्रता सेनानियों की थी जिन्होंने भारत माता की आजादी के लिए अपनी बहुमूल्य जान कुर्बान कर दी थी।
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