40 अंतरराज्यीय बस रूटों के मामले में बड़ा फैसला, निजी ऑपरेटर की याचिका पर सरकार को नोटिस

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 40 अंतरराज्यीय बस रूटों पर लागू की जा रही विशेष परिवहन योजना के नोटिफिकेशन पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने सरकार और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है।

Aug 01, 2026 - 10:21
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40 अंतरराज्यीय बस रूटों के मामले में बड़ा फैसला, निजी ऑपरेटर की याचिका पर सरकार को नोटिस

ग्वालियर। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा राज्य के 40 अंतरराज्यीय बस रूटों पर लागू की जा रही बहुचर्चित 'विशेष परिवहन योजना' की प्रक्रिया को माननीय मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से एक बड़ा झटका लगा है। अदालत ने इस मामले में दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य शासन द्वारा जारी किए गए गत 7 जुलाई 2026 के आधिकारिक नोटिफिकेशन पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी है।

इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने राज्य शासन और अन्य सभी संबंधित पक्षों को औपचारिक नोटिस जारी कर इस पर विस्तृत जवाब तलब किया है। अब सरकार की तरफ से जवाब पेश किए जाने के बाद ही इस महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई आगे बढ़ाई जाएगी।

यह अहम याचिका एक निजी स्टेज कैरेज बस ऑपरेटर धर्मेंद्र सिंह की ओर से हाईकोर्ट में दायर की गई थी। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि वह पिछले कई सालों से इन प्रस्तावित मार्गों के विभिन्न हिस्सों पर अपनी बसों का कानूनी रूप से संचालन कर रहा है, और सरकार की इस नई योजना से उसके व्यापारिक और बिजनेस राइट्स का सीधा हनन हो रहा है।

⚖️ याचिका में उठाए गए दो सबसे बड़े और गंभीर कानूनी सवाल

अदालत में दायर की गई इस याचिका में मुख्य रूप से दो बड़े और गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जिन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं:

  • पहला सवाल (हितों का टकराव): इस योजना पर मिलने वाली तमाम आपत्तियों का निपटारा करने की जिम्मेदारी परिवहन विभाग के सचिव मनीष सिंह (IAS) को सौंपी गई थी। लेकिन सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी बात यह है कि आईएएस अधिकारी मनीष सिंह खुद ही 'मध्य प्रदेश यात्री परिवहन एवं इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड' के प्रबंध संचालक (MD), MPSRTC के MD और इंटर स्टेट ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी के CEO जैसे अत्यंत प्रमुख पदों पर एक साथ काबिज हैं। इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में जोरदार दलील दी कि जिस कंपनी को इस योजना से सीधा फायदा पहुँचाया जा रहा है, उसी कंपनी के मुख्य प्रबंध संचालक (MD) ही इस योजना पर आने वाली आपत्तियों पर खुद फैसला सुनाएंगे। यह कानून के उस सर्वमान्य सिद्धांत—"कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता"—का सीधा और खुला उल्लंघन है, और ऐसे में किसी भी निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

  • दूसरा सवाल (STU का दर्जा): याचिका में यह भी कहा गया है कि सरकार स्पेशल पर्पज व्हीकल (SPV) और कंपनी एक्ट के तहत नई कंपनियां बनाकर मनमाने तरीके से बसें चलाना चाहती है। केवल कागजों पर एक नई कंपनी बना देने से उसे कानूनन 'स्टेट ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग' (STU) का दर्जा स्वतः ही हासिल नहीं हो जाता है। इसलिए, ऐसी कंपनियों को मोटर वाहन अधिनियम के अध्याय-6 के तहत मिलने वाले विशेष विशेषाधिकार दिए ही नहीं जा सकते हैं।

इन्हीं सभी बेहद गंभीर और पुख्ता कानूनी आधारों पर याचिकाकर्ता ने सरकार की पूरी अधिसूचना को गैर-कानूनी और असंवैधानिक बताते हुए इसे पूरी तरह से निरस्त करने की गुहार लगाई थी, जिसके बाद अब हाईकोर्ट ने इस नोटिफिकेशन पर बड़ा स्टे लगा दिया है।

🔍 आखिर क्या है पूरा विवाद और क्या था सरकार का प्रस्ताव?

यह पूरा विवाद मुख्य रूप से राज्य सरकार द्वारा मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा-99 के तहत पिछले दिनों यानी 7 जुलाई 2026 को जारी की गई एक अधिसूचना से जुड़ा हुआ है।

इस अधिसूचना के माध्यम से प्रदेश के 40 प्रमुख अंतरराज्यीय बस रूटों पर बसों के संचालन का पूर्ण एकाधिकार (Monopoly) 'मध्य प्रदेश यात्री परिवहन एवं इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड' नामक कंपनी को सौंपने का प्रस्ताव रखा गया था। इस संबंध में सरकार द्वारा आम जनता और निजी बस ऑपरेटर्स से आपत्तियां और सुझाव मांगे गए थे, जिसके बाद यह मामला कानूनी विवादों में घिर गया और अब अदालत के हस्तक्षेप के बाद इस पर रोक लग गई है।

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