उज्जैन में सावन के पहले सोमवार पर उमड़ा जनसैलाब, तड़के 3 बजे खुले महाकालेश्वर मंदिर के पट

उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में सावन के पहले सोमवार पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी है। तड़के 3 बजे भस्म आरती के बाद भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार किया गया।

Aug 03, 2026 - 13:00
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उज्जैन में सावन के पहले सोमवार पर उमड़ा जनसैलाब, तड़के 3 बजे खुले महाकालेश्वर मंदिर के पट

उज्जैन: सावन मास के पहले सोमवार के पावन अवसर पर आज सुबह से ही धर्मनगरी उज्जैन के सभी प्रमुख शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है। बाबा महाकाल को दूध और जल अर्पित करने के लिए भक्तों का तांता लगा हुआ है। विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग श्री महाकालेश्वर धाम में तो कल देर रात से ही भारी जनसैलाब उमड़ा हुआ था। तड़के ठीक 3 बजे भस्म आरती के लिए जैसे ही मंदिर के पट खोले गए, पूरा मंदिर परिसर "जय श्री महाकाल" और "हर हर महादेव" के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा और माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो गया।

🌿 विजया स्वरूप में श्रृंगार और आज उपवास पर हैं बाबा महाकाल

श्री महाकालेश्वर की भव्य भस्म आरती संपन्न होने के बाद भगवान का 'विजया स्वरूप' में विशेष श्रृंगार किया गया।

भक्तों के कठोर तप और आराधना को देखकर ऐसी मान्यता है कि भगवान महाकाल भी श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार एवं प्रदोष के दिन उपवास पर रहते हैं। इसी परंपरा के तहत आज भगवान उपवास पर हैं, जिसके चलते उन्हें सिर्फ फलाहार का ही भोग लगाया गया है। अब देर शाम नगर भ्रमण के बाद जब भगवान वापस मंदिर लौटेंगे, तब उन्हें संपूर्ण भोग अर्पित किया जाएगा।

🪔 सबसे पहले होती है सभा मंडप में विराजमान भगवान वीर बाल भद्र की पूजा

मंदिर के वरिष्ठ पुजारी महेश गुरु ने जानकारी देते हुए बताया कि, "आज श्रावण मास के पहले सोमवार को मंदिर के कपाट तड़के 3 बजे खोले गए। सबसे पहले सभा मंडप में विराजमान भगवान वीर बाल भद्र की पूजा-अर्चना की गई, जिसके बाद भगवान का दैनिक पूजन संपन्न हुआ।"

उन्होंने बताया कि घंटा बजाकर महादेव महाकाल को यह संकेत दिया जाता है कि हम आपके द्वार के कपाट खोल रहे हैं और गर्भगृह में प्रवेश करना चाहते हैं। इसके पश्चात भगवान मान भद्र का पूजन और मुख्य द्वार खोलकर गर्भगृह की देहरी का पूजन किया जाता है, और इस तरह गर्भगृह में प्रवेश का पारंपरिक क्रम पूरा होता है।

💧 पंचाभिषेक और गर्भगृह में शिव परिवार का स्नान

गर्भगृह के भीतर मौजूद भगवान गणेश, कार्तिकेय और नंदी सहित संपूर्ण शिव परिवार को विधिवत स्नान कराया गया।

इस दौरान सबसे पहले कपूर आरती संपन्न हुई, जिसके बाद सामान्य दर्शनार्थियों को भगवान के सुलभ दर्शन के लिए प्रवेश दिया गया। इसके बाद 'हरि ओम जल' चढ़ाने वाले नियमित भक्तों, पुजारियों और पुरोहितों द्वारा भगवान को जल अर्पित किया गया। भगवान का विशेष पंचाभिषेक हुआ और विभिन्न प्रकार की पवित्र सामग्रियों तथा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजन किया गया। इसके बाद ध्यान, आह्वाहन, भगवान को आसन देना, चरण धोना और अंत में उनका मनमोहक श्रृंगार किया गया।

🔥 भस्म आरती के बाद निराकार से साकार रूप में दर्शन

पुजारी महेश गुरु ने आगे बताया कि श्रृंगार के बाद श्वेत वस्त्र ओढ़ाकर भगवान को भस्म से स्नान कराया जाता है, जिसे 'भस्म आरती' या 'मंगला आरती' कहा जाता है।

इसके बाद रजत मुकुट, आभूषण और वस्त्र अर्पण किए जाते हैं, जिससे भगवान निराकार से साकार स्वरूप में भक्तों को अपने दिव्य दर्शन देते हैं। दिव्यता के साथ धूप व दीप दर्शन कराए जाते हैं और नैवेद्य चढ़ाया जाता है। इसके साथ ही अल सुबह की यह पूरी प्रक्रिया संपन्न होती है और भगवान पुनः साकार से निराकार रूप में आ जाते हैं। इसके बाद वे दिनभर भक्तों को दर्शन देते हैं और शाम 4 बजे मंदिर से नगर भ्रमण पर निकलेंगे तथा 6:30 बजे वापस लौटेंगे। संध्या आरती के बाद उन्हें संपूर्ण भोग लगेगा और शयन आरती तक दर्शन का यह सिलसिला जारी रहेगा।

⏰ मंदिर में प्रतिदिन होती हैं कुल 5 आरतियां

महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन कुल पांच आरतियां संपन्न होती हैं। पहली भस्म आरती वंश परंपरा के पुजारियों द्वारा की जाती है।

इसके बाद सुबह 7 बजे आरती होती है, जिसमें चावल, दही और शक्कर का भोग लगाया जाता है तथा सामान्य पूजन-श्रृंगार होता है (हालांकि प्रत्येक सोमवार को सिर्फ फलाहार का भोग लगता है)। इसके पश्चात सुबह 10 बजे पुनः पंचामृत पूजा होती है और पूर्ण भोग लगाया जाता है, जिसमें दाल, चावल, सब्जी, रोटी, भजिए और लड्डू शामिल होते हैं, जिसे 'भोग आरती' कहा जाता है। शाम 5 बजे भगवान का स्नान होने के बाद जल चढ़ाना बंद कर दिया जाता है।

👑 ग्वालियर स्टेट के समय से चली आ रही है सुख-समृद्धि की आरती परंपरा

श्रृंगार के पश्चात भगवान राजाओं के स्वरूप में विराजमान रहते हैं और निराकार से साकार रूप में आ जाते हैं। इसके बाद शाम 7 बजे 'संध्या आरती' होती है, जिसमें दूध का भोग लगाया जाता है।

रात 10:20 बजे 'शयन आरती' होती है, जिसमें मेवे का प्रसाद चढ़ाया जाता है और मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। भगवान से विश्राम करने की प्रार्थना की जाती है। भस्म आरती और शयन आरती मंदिर की प्राचीन परंपराएं हैं, जबकि दिन की तीन आरतियां—राजकीय आरती, सुख-समृद्धि और अन्य आरतियां—ग्वालियर स्टेट के समय से अनवरत चली आ रही हैं।

✨ श्रावण मास में शिव दर्शन और पूजन का विशेष महत्व

मंदिर के पुजारी महेश गुरु ने सावन दर्शन का महत्व बताते हुए कहा कि श्रावण मास में सच्चे मन से शिव दर्शन करने से व्यक्ति के अनेक जन्मों के पापों का नाश होता है।

इस पवित्र माह में जो भी श्रद्धालु भगवान शिव को जलधारा, दुग्धधारा और बेलपत्र अर्पित करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। एक बेलपत्र से लेकर एक लाख बेलपत्र तक भगवान को अर्पित करने से कई महान यज्ञों का फल प्राप्त होता है। इसके अलावा, इन दिनों जितने भी व्रत आते हैं, उनका पालन माता सती और माता पार्वती ने किया था। दोनों ने अपने समय में भगवान शिव को पाने और उन्हें रिझाने के लिए व्रत किए थे। सनातन धर्म में यह मान्यता है कि जो महिलाएं चार प्रहर की पूजा और व्रत करती हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और कुंवारी कन्याओं को मनवांछित वर की प्राप्ति होती है।

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