जाधव सागर के किनारे बसा है महाभारत कालीन सिद्धेश्वर मंदिर, 52 कुंडों और ओंकारेश्वर शिवलिंग से जुड़ा है इतिहास
शिवपुरी के जाधव सागर झील के पास स्थित सिद्धेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। यहाँ 52 पवित्र कुंड और ओंकारेश्वर से लाया गया शिवलिंग स्थापित है।
शिवपुरी: शहर में छत्री रोड पर स्थित सिद्धेश्वर महादेव मंदिर इस पूरे आंचल की गहरी आस्था, संस्कृति और ऐतिहासिक पहचान का मुख्य केंद्र है। खूबसूरत जाधव सागर झील के पूर्वी किनारे पर बसा यह प्राचीन मंदिर सदियों पुराना है। स्थानीय निवासियों और बुजुर्गों की मानें तो इस पवित्र परिसर में कदम रखते ही जो आत्मिक शांति और सुकून मिलता है, उसकी तुलना किसी अन्य स्थान से नहीं की जा सकती है।
चाहे पवित्र सावन का महीना हो या फिर महाशिवरात्रि का महापर्व, यहाँ हमेशा शिवभक्तों और श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ता रहता है। हर साल महाशिवरात्रि के ठीक बाद लगने वाला प्रसिद्ध 'सिद्धेश्वर-बाणगंगा मेला' शिवपुरी जिले का सबसे बड़ा और सबसे प्राचीन धार्मिक आयोजन माना जाता है, जहाँ जिलेभर के अलावा दूर-दराज के गांवों और कस्बों से भी हजारों की संख्या में लोग अपनी मन्नतें लेकर खिंचे चले आते हैं।
🏹 महाभारत कालीन इतिहास और बाणगंगा के 52 पवित्र कुंडों का अनूठा रहस्य
सिद्धेश्वर मंदिर और इसके आसपास के बाणगंगा क्षेत्र का सीधा संबंध प्राचीन महाभारत काल की कहानियों से जुड़ा हुआ है।
मंदिर के सेवादार सूरज भट्ट बताते हैं कि, "जब पांडव अपने अज्ञातवास के कठिन दौर के दौरान जंगलों में भटक रहे थे, तब वे शिवपुरी और बैराड़ के घने जंगलों में कुछ समय के लिए ठहरे थे।" उसी दौरान पांडवों को तेज प्यास लगी, लेकिन आसपास पानी की एक बूंद तक मौजूद नहीं थी। ऐसी विकट स्थिति में अर्जुन ने अपने गांडीव धनुष पर बाण चढ़ाया और पूरी शक्ति से जमीन पर दे मारा। तीर लगते ही धरती का सीना चीरकर शीतल जल की धारा फूट पड़ी। बाण के प्रहार से गंगा प्रकट हुई थी, इसलिए इस पवित्र जगह को 'बाणगंगा' के नाम से जाना जाने लगा। यह बाणगंगा क्षेत्र आज भी अपने 52 रहस्यमयी और पवित्र कुंडों के लिए पूरे इलाके में मशहूर है।
🔱 प्रसिद्ध ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग से लाया गया था यहाँ का मुख्य शिवलिंग
सिद्धेश्वर मंदिर के गर्भ गृह में विराजित पावन शिवलिंग को लेकर यह मान्यता है कि इसे प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर से विशेष रूप से लाकर यहाँ स्थापित किया गया था।
केवल भगवान शिव ही नहीं, बल्कि इस मंदिर परिसर में भगवान गणेश, कार्तिकेय, राम-जानकी, राधा-कृष्ण और लक्ष्मी-नारायण की भी बेहद दुर्लभ, प्राचीन और कलात्मक मूर्तियां मौजूद हैं। मंदिर के ठीक पीछे महान गुरु गोरखनाथ का प्राचीन मंदिर भी स्थित है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ 12वीं शताब्दी की सिद्ध गोरखनाथ जी की प्रतिमा स्थापित है। लोक परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार, स्वयं गुरु गोरखनाथ ने इस पवित्र स्थान पर बैठकर कठिन तपस्या की थी।
👑 सिंधिया राजवंश और महारानी बैजाबाई का मंदिर के निर्माण में योगदान
इतिहासकारों के अनुसार, आज मंदिर का जो भव्य और सुंदर स्वरूप हमें दिखाई देता है, उसका जीर्णोद्धार 19वीं शताब्दी में सिंधिया शासनकाल के दौरान किया गया था।
ग्वालियर रियासत के शासक दौलतराव सिंधिया की विदुषी पत्नी महारानी बैजाबाई सिंधिया ने शिवपुरी में कई शानदार शिव मंदिरों का निर्माण और उनका संरक्षण कराया था। सिद्धेश्वर मंदिर भी उन्हीं प्रमुख ऐतिहासिक केंद्रों में से एक बना। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि शिवपुरी का प्रसिद्ध भदैया कुंड, ऐतिहासिक सिंधिया छतरियां, जाधव सागर और यह सिद्धेश्वर मंदिर—ये सभी महत्वपूर्ण स्थान एक ही सीधी रेखा (Straight Line) में स्थित हैं।
🧘 साधु-संतों की तपोभूमि और विजयादशमी पर रावण दहन की परंपरा
आज से लगभग 150 साल पहले इस मंदिर के चारों तरफ घना और वीरान जंगल हुआ करता था, जहाँ हर समय उच्च कोटि के सिद्ध साधु-संतों का डेरा जमा रहता था।
सावन के पावन महीने में आज भी दूर-दूर से श्रद्धालु कई किलोमीटर पैदल चलकर और कांवड़ में पवित्र जल भरकर महादेव का जलाभिषेक करने पहुँचते हैं। इसके अलावा, विजयादशमी के पावन पर्व पर आज भी इस मंदिर परिसर में पारंपरिक तरीके से रावण दहन की बरसों पुरानी परंपरा बड़े हर्षोल्लास और धूमधाम से निभाई जाती है। ऐसी अटूट मान्यता है कि ओंकारेश्वर से लाए गए इस दिव्य शिवलिंग और बाणगंगा के पवित्र कुंडों के दर्शन मात्र से ही सच्चे भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है।
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