'दूध वाला गांव' के नाम से मशहूर हुआ बालापाट, पढ़े-लिखे युवाओं ने पशुपालन को बनाया स्वरोजगार का जरिया

बुरहानपुर के बालापाट गांव के युवाओं ने पशुपालन को अपनाकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है। यहाँ के 80 परिवारों ने दुग्ध उत्पादन और जैविक खाद से अपनी आय को दोगुना कर लिया है।

Aug 09, 2026 - 13:33
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'दूध वाला गांव' के नाम से मशहूर हुआ बालापाट, पढ़े-लिखे युवाओं ने पशुपालन को बनाया स्वरोजगार का जरिया

बुरहानपुर: जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर खकनार ब्लॉक का बालापाट गाँव आज पूरे प्रदेश में एक नई पहचान बना चुका है। गवली समाज की मेहनत और पशुपालन के प्रति अटूट लगन ने इस छोटे से गाँव को 'दूध वाले गाँव' के रूप में स्थापित कर दिया है। 1250 की कुल आबादी वाले इस गाँव में 225 परिवार रहते हैं, जिनमें से करीब 80 परिवारों ने पशुपालन को अपनी आजीविका का मुख्य आधार बना लिया है। यहाँ के लोगों ने न केवल पारंपरिक तरीके से, बल्कि आधुनिक और हाईटेक तरीके से पशुपालन अपनाकर सफलता की नई इबारत लिखी है।

🐄 हाईटेक पशुपालन: हर दिन होता है डेढ़ हजार लीटर से ज्यादा दूध का उत्पादन

बालापाट के पशुपालकों के पास वर्तमान में 1000 से अधिक दुधारू पशु हैं, जिनसे प्रतिदिन 1500 लीटर से अधिक दूध का उत्पादन होता है। यह दूध केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि आसपास के खकनार और डेढ़तलाई जैसे कई बड़े गाँवों में भी सप्लाई किया जाता है। हैरान करने वाली बात यह है कि अब यहाँ के ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट युवा भी इस व्यवसाय से जुड़ रहे हैं, जो वैज्ञानिक पद्धतियों से पशुओं की देखभाल और दुग्ध उत्पादन कर रहे हैं।

🌱 जैविक खाद से मिल रही दोहरी कमाई

इस गाँव की सफलता का एक बड़ा राज है—पशुपालन और खेती का सही तालमेल। पशुओं से प्राप्त गोबर का उपयोग करके ग्रामीण उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद तैयार करते हैं। इस खाद का उपयोग वे अपने खेतों में करते हैं, जिससे फसलों की पैदावार में काफी वृद्धि हुई है। पशुपालकों के लिए यह 'दोहरी आय' का जरिया बन गया है—एक तरफ दूध बेचकर कमाई, तो दूसरी तरफ खाद से खेती में कम लागत और अधिक पैदावार।

🎓 यूपीएससी में असफलता के बाद बनी सफलता की राह

गाँव के शिक्षित युवा रविंद्र यादव की कहानी प्रेरणादायक है। ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने तीन बार यूपीएससी की परीक्षाओं में अपनी किस्मत आजमाई, लेकिन सफलता न मिलने पर उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने पूर्वजों के व्यवसाय को ही अपनी शक्ति बनाया और अब हाईटेक तरीके से पशुपालन कर रहे हैं। वे आज अन्य युवाओं को भी बेहतर नस्ल के पशु खरीदने और वैज्ञानिक तरीके से पालन करने का मार्गदर्शन दे रहे हैं।

🤝 सरकार से सहयोग की अपेक्षा

बालापाट के पशुपालक अब चाहते हैं कि प्रशासन और सरकार इस मॉडल को और बड़ा बनाने में उनकी मदद करे। रविंद्र यादव और अन्य पशुपालकों का मानना है कि यदि सरकार उन्हें ऊँची नस्ल के पशु खरीदने के लिए सहायता या सब्सिडी उपलब्ध कराए, तो वे न केवल इस व्यवसाय को दोगुना कर सकते हैं, बल्कि बुरहानपुर जिले को दुग्ध उत्पादन में प्रदेश का सबसे बड़ा केंद्र बना सकते हैं।

📜 500 वर्षों से चली आ रही परंपरा का आधुनिक रूप

गाँव के सहायक सचिव गजानन यादव बताते हैं कि गवली समाज करीब 500 वर्षों से इस व्यवसाय से जुड़ा है। अब इस व्यवसाय से प्रेरित होकर 20 से ज्यादा आदिवासी परिवार भी जुड़ गए हैं, जिससे पूरे गाँव में भाईचारे और आर्थिक विकास का माहौल बना है। प्रशासन समय-समय पर शिविर लगाकर पशु चिकित्सा और उन्नत पालन के तरीके सिखाता है, जिससे 'प्योर दूध' की आपूर्ति पूरे क्षेत्र में बनी रहती है।

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