बीमार श्यामू की जगह अब सुमा लाएगी मनमहेश की सवारी, जानिए उसकी डाइट और इतिहास
उज्जैन में बाबा महाकाल की सवारी में इस बार बड़ा बदलाव हुआ है। स्वास्थ्य कारणों से श्यामू हाथी की जगह तमिलनाडु से आई 50 साल की हथिनी 'सुमा' को शामिल किया गया है।
मध्य प्रदेश के पवित्र नगरी उज्जैन में बाबा महाकाल की पारंपरिक सवारी में इस बार आस्था और परंपरा के साथ एक बेहद भावुक कर देने वाला बदलाव देखने को मिला है। सालों से सवारी की शान रहे गजराज (हाथी) की इस गौरवशाली परंपरा में अब एक नया नाम जुड़ गया है। जहां एक तरफ पिछले करीब 35 वर्षों तक 'रामू' और उसके बाद 10 वर्षों तक 'श्यामू' ने बाबा महाकाल के नगर भ्रमण में अपनी अहम भूमिका निभाई, वहीं अब स्वास्थ्य कारणों के चलते श्यामू को फिलहाल आराम दिया गया है और उसकी जगह तमिलनाडु से लाई गई 50 वर्षीय हथिनी 'सुमा' ने यह बड़ी जिम्मेदारी संभाल ली है।
👁️ श्रावण के दूसरे सोमवार पर नए मेहमान पर टिकी लाखों श्रद्धालुओं की निगाहें
श्रावण मास के दूसरे सोमवार को जब बाबा महाकाल अपने राजसी ठाठ-बाट और पूरे लाव-लश्कर के साथ नगर भ्रमण पर निकले, तो सवारी मार्ग पर उमड़े लाखों श्रद्धालुओं की निगाहें एक खास नए मेहमान पर टिक गईं। फूलों की वर्षा, गूंजते जयकारों, भजन मंडलियों, घोड़े, तोप, पुलिस बैंड और शानदार सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बीच हथिनी सुमा ने पहली बार बाबा महाकाल की सवारी में शिरकत की। सुमा की पीठ पर बाबा महाकाल का मनमहेश स्वरूप विराजित था, जबकि पालकी में बाबा चंद्रमौलेश्वर रूप में नजर आए। सुमा की पीठ पर मनमहेश के दर्शन करना श्रद्धालुओं के लिए एक नया और अद्भुत अनुभव था।
🩺 स्वास्थ्य कारणों के चलते श्यामू को किया गया सवारी से दूर
लगभग 29 वर्षीय हाथी 'श्यामू' ने पिछले 10 सालों से बाबा महाकाल की सवारी में अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाई थी। वन विभाग के डीएफओ अनुराग तिवारी ने इस बदलाव की जानकारी देते हुए बताया कि डॉक्टरों की टीम ने स्वास्थ्य कारणों के चलते श्यामू को फिलहाल सवारी के लिए अनफिट घोषित किया है। जब तक वह पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो जाते, उन्हें सवारी से दूर रखने का निर्णय लिया गया है। पहली सवारी में श्यामू की तबीयत थोड़ी बिगड़ती देख, परंपरा को बिना किसी बाधा के जारी रखने के लिए तमिलनाडु की हथिनी सुमा को शामिल करने का फैसला किया गया।
🎯 सुरक्षा और सहजता के लिए पहले कराया गया था विशेष ट्रायल
डीएफओ अनुराग तिवारी ने आगे बताया कि सुमा को अचानक से भीड़भाड़ के बीच नहीं उतारा गया। मुख्य सवारी से ठीक पहले शुक्रवार को वन विभाग और पशु चिकित्सकों की टीम की निगरानी में उसे पूरे सवारी मार्ग पर घुमाकर ट्रायल कराया गया था, ताकि वह रास्ते की बनावट, भारी भीड़ और शहर के वातावरण से पूरी तरह सहज हो सके। मुख्य सवारी के दौरान भी सुमा के साथ पांच विशेष महावत, वन विभाग की टीम और डॉक्टरों का दल मुस्तैद रहा।
🌴 तमिलनाडु से उज्जैन आई 50 साल की सुमा और उसकी राजसी डाइट
निर्मोही अखाड़े से जुड़े और हथिनी सुमा के मालिक हेमंत बैरागी व साथी सौरभ कुशवाह ने बताया कि सुमा की उम्र करीब 50 वर्ष है। जब वह 46 वर्ष की थी, तब उसे तमिलनाडु के त्रिची-पल्ली स्थित एक मंदिर से निर्मोही अखाड़े, उज्जैन को दान में दी गई थी। अब वह उज्जैन की इस ऐतिहासिक धार्मिक परंपरा का हिस्सा बन चुकी है। सुमा की दैनिक खुराक भी किसी राजसी मेहमान से कम नहीं है। उसकी देखरेख और भोजन पर हर रोज भारी-भरकम खर्च किया जाता है:
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दैनिक आहार: हर रोज 100 किलो से अधिक ताजे फल, करीब 50 चारे की पिंडियां, 1 क्विंटल गन्ना, 10 किलो गुड़, 1 किलो शुद्ध घी और लगभग 10 किलो बाजरे की खिचड़ी दी जाती है।
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खर्च और देखभाल: सुमा के भोजन और रख-रखाव पर प्रतिदिन लगभग 8,000 रुपये खर्च होते हैं, और उसकी सेवा के लिए चार विशेष महावत नियुक्त हैं जिन्हें 15,000 रुपये प्रतिमाह वेतन दिया जाता है।
📜 रामू और श्यामू के बाद अब महाकाल की सवारी में सुमा का नया अध्याय
महाकाल की सवारी में हाथियों का यह इतिहास दशकों पुराना है। साल 1980 से महावत शर्मन गिरी का हाथी 'रामू' इस परंपरा का अहम हिस्सा रहा था, जिसकी 2016 में करीब 75 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद श्यामू ने यह जिम्मेदारी संभाली और एक दशक तक सेवा दी। अब 2026 में श्यामू के अस्वस्थ होने के बाद सुमा की एंट्री इस परंपरा की अगली और महत्वपूर्ण कड़ी बन गई है। श्रद्धालुओं को अब इस बात का भी इंतजार रहेगा कि श्यामू कब पूरी तरह स्वस्थ होकर लौटते हैं और सुमा अपनी इस नई भूमिका को किस प्रकार आगे बढ़ाती है।
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