Sehore Forest Scam: कैंपा मद में बड़ी धांधली, 6 महीने बाद भी जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई ठंडे बस्ते में

सीहोर वन विभाग में कैंपा मद से 3.84 करोड़ रुपये का फर्जीवाड़ा। SDO के जाली हस्ताक्षर कर निकाला गया फंड, 6 महीने से जांच रिपोर्ट दबी, नहीं हुई कोई कार्रवाई।

Jun 9, 2026 - 15:30
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Sehore Forest Scam: कैंपा मद में बड़ी धांधली, 6 महीने बाद भी जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई ठंडे बस्ते में

सीहोर। जिले के वन विभाग में एक बेहद गंभीर वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है। उप वनमंडलाधिकारी (SDO) राजेश शर्मा ने आरोप लगाया है कि उनके अतिरिक्त प्रभार के दौरान उनके फर्जी हस्ताक्षर का उपयोग करके कैंपा (CAMPA) मद से लगभग 3 करोड़ 84 लाख 54 हजार 333 रुपये का भुगतान कर दिया गया है। मामले की गंभीरता के बावजूद, छह महीने बीत जाने के बाद भी दोषी अधिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।

 कैसे हुआ करोड़ों का फर्जीवाड़ा?

एसडीओ राजेश शर्मा के अनुसार, वे 31 दिसंबर 2023 से 16 मार्च 2024 तक बुधनी उपवनमंडल के अतिरिक्त प्रभार पर थे। इस अवधि में उन्होंने नियमानुसार केवल 1.78 करोड़ रुपये के प्रमाणकों (Vouchers) को ही सत्यापित किया था। लेकिन बाद में पता चला कि उनके फर्जी हस्ताक्षर का उपयोग कर कुल 5.63 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। यानी, लगभग 3.84 करोड़ रुपये की राशि उनके नाम का दुरुपयोग कर डकार ली गई। इतना ही नहीं, 16 मार्च 2024 को प्रभार छोड़ने के दिन ही 76 लाख रुपये से अधिक के 15 प्रमाणक आनन-फानन में डिस्पैच किए गए।

 किन कार्यों के नाम पर निकला फंड?

यह धांधली वाहन-डीजल व्यय, जल संचयन संरचना निर्माण, गेट फिक्सिंग, नर्मदा रेत क्रय और गोबर खाद क्रय जैसे कार्यों के नाम पर की गई है। इन संदिग्ध प्रमाणकों पर वन परिक्षेत्र अधिकारी एमपी सिंह (बुधनी) के हस्ताक्षर भी मौजूद थे। कैंपा फंड, जो विशेष रूप से जंगलों की क्षतिपूर्ति के लिए केंद्र सरकार द्वारा दिया जाता है, उसका इस तरह दुरुपयोग विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े करता है।

 जांच के नाम पर टालमटोल, रिपोर्ट दब गई

इस मामले की जांच के लिए उप वनमंडलाधिकारी एल्विन बर्मन के नेतृत्व में तीन सदस्यीय टीम गठित की गई थी, जिसने दिसंबर 2025 में ही अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई है। डीएफओ अर्चना पटेल का कहना है कि जांच टीम ने भौतिक सत्यापन किया था, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि प्रमाणकों पर हस्ताक्षर किसके हैं। अब सवाल यह है कि यदि हस्ताक्षर फर्जी हैं, तो विभाग अभी तक एफआईआर दर्ज कराने से क्यों बच रहा है?

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