इंदौर के कथक गुरु डॉ. पुरु दाधीच को मिला अकैडमी रत्न सम्मान, 37 साल बाद एमपी को मिला गौरव
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने नई दिल्ली में इंदौर के कथक गुरु डॉ. पुरु दाधीच को संगीत नाटक अकादमी रत्न और भेरू सिंह चौहान को अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया है।
देश की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित एक गरिमामयी और भव्य समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने देश भर के प्रतिष्ठित और दिग्गज कलाकारों को प्रतिष्ठित 'संगीत नाटक अकादमी रत्न सदस्यता' और 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया। इस राष्ट्रीय सम्मान समारोह में मध्य प्रदेश के इंदौर शहर का नाम पूरे देश में रोशन हुआ है। इंदौर के प्रख्यात कथक गुरु डॉ. पुरु दाधीच को कथक के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए 'संगीत नाटक अकादमी रत्न सदस्यता' से नवाजा गया है। खास बात यह है कि मध्य प्रदेश के किसी कलाकार को यह सर्वोच्च सम्मान अंतिम बार वर्ष 1988 में महान संगीतकार कुमार गंधर्व को मिला था। इस प्रकार करीब 37 साल के लंबे अंतराल के बाद प्रदेश के किसी कलाकार को यह प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुआ है। इसके साथ ही, इंदौर के प्रसिद्ध कबीर लोक गायक भेरू सिंह चौहान को वर्ष 2025 के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
💃 चित्रकला से कथक का सफर और 'दाधीच शैली' की स्थापना, ऐसा रहा डॉ. पुरु दाधीच का प्रेरणादायक जीवन
डॉ. पुरु दाधीच अपने शुरुआती जीवन में चित्रकला से जुड़े हुए थे, लेकिन पंडित दुर्गाप्रसाद की प्रेरणा से उन्होंने चित्रकला छोड़कर नृत्य की दुनिया में कदम रखा। वर्ष 1961 में जब उज्जैन के माधव संगीत महाविद्यालय में नृत्य विधा को शामिल करने की योजना बनी, तो उन्हें शिक्षक के तौर पर बुलाया गया। उस समय देश में नृत्य का कोई निश्चित सिलेबस (पाठ्यक्रम) नहीं था, ऐसे में उन्होंने खेरागढ़ विश्वविद्यालय के लिए नृत्य का सिलेबस तैयार किया, जो 1965 के आसपास देश भर में लागू हुआ। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में भी नृत्य पाठ्यक्रम शुरू करवाने और स्नातकोत्तर कक्षाएं लगवाने में उनका अहम योगदान रहा। मध्य प्रदेश की अपनी कोई पारंपरिक शास्त्रीय शैली न होने के कारण उन्होंने प्राचीन 'भक्ति नृत्यम' और 'ध्रुपद नृत्यम' की परंपरा को पुनर्जीवित किया तथा शास्त्रों में दी गई मुद्राओं के आधार पर एक नई शैली विकसित की, जिसे 'दाधीच शैली' या 'मध्यप्रदेश नृत्य शैली' के रूप में पहचान मिली।
🎶 नौ साल की उम्र से कबीर लोक गायन को समर्पित, पद्मश्री सम्मानित भेरू सिंह चौहान का सफर
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित होने वाले कबीर लोक गायक भेरू सिंह चौहान महू तहसील के बजरंगपुरा गांव के रहने वाले हैं। अपने पिता से प्रेरणा पाकर उन्होंने महज नौ वर्ष की उम्र से ही लोक गायन से अपना नाता जोड़ लिया था और अपना पूरा जीवन कबीर के संदेशों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए समर्पित कर दिया। चौदह वर्ष की उम्र में उन्होंने मंजीरे बजाना शुरू किया और धीरे-धीरे भजनों की गहरी समझ विकसित करते हुए कबीर वाणी गाना शुरू किया। वर्ष 1989 में उन्होंने आकाशवाणी में ऑडिशन दिया और 'बी ग्रेड' में चयनित हुए, जिसके बाद 1993-94 में हाईग्रेड के लिए चुने गए और दूरदर्शन पर भी प्रस्तुतियां देने लगे। उनकी इसी लोक साधना को देखते हुए पिछले वर्ष उन्हें 'पद्मश्री' से भी सम्मानित किया जा चुका है। उल्लेखनीय है कि संगीत नाटक अकादमी की रत्न सदस्यता देश का एक ऐसा सर्वोच्च सांस्कृतिक सम्मान है, जो एक समय में देश के अधिकतम केवल 40 जीवित महान कलाकारों के पास ही रहता है।
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