Bhataphool Rice: विलुप्ति की कगार पर है धान की खास किस्म 'भाटाफूल', जानें शहडोल के किसानों ने कैसे बचा रखा है इसका अस्तित्व

शहडोल के किसानों ने संरक्षित की धान की पुरानी देसी किस्म 'भाटाफूल'। स्वाद में लाजवाब और जंगली धान को हटाने में मददगार। जानें इसकी खास खूबियां।

Jun 20, 2026 - 18:05
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Bhataphool Rice: विलुप्ति की कगार पर है धान की खास किस्म 'भाटाफूल', जानें शहडोल के किसानों ने कैसे बचा रखा है इसका अस्तित्व

शहडोल। मानसून के आगमन के साथ ही शहडोल जिले में खरीफ सीजन की शुरुआत हो चुकी है। विंध्य क्षेत्र का शहडोल धान की खेती के लिए जाना जाता है, जहाँ आज भी कुछ जागरूक किसानों ने धान की अपनी पुरानी और पारंपरिक किस्मों को सहेज कर रखा है। इन्हीं में से एक खास वैरायटी है 'भाटाफूल'। यह न केवल अपने स्वाद के लिए जानी जाती है, बल्कि खेती की समस्याओं को सुलझाने में भी अहम भूमिका निभाती है।

💜 बैगनी बालियां और सफेद चावल: भाटाफूल की अनूठी पहचान

ऐंताझर गांव के किसान सत्येंद्र नाथ श्रीवास्तव बताते हैं कि वे कई वर्षों से भाटाफूल की खेती कर रहे हैं। इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी बैगनी रंग की बालियां हैं। हालांकि धान का बाहरी रंग बैगनी होता है, लेकिन इसका चावल पूरी तरह सफेद और खाने में अत्यंत स्वादिष्ट होता है। आज के हाइब्रिड बीजों के दौर में भाटाफूल का उत्पादन भले ही कम हो, लेकिन इसकी गुणवत्ता की वजह से पुराने किसान इसे आज भी अपने बीजों में शामिल किए हुए हैं।

🛡️ जंगली धान (पसही) का काल है भाटाफूल

कृषि वैज्ञानिक डॉ. मृगेंद्र सिंह के अनुसार, भाटाफूल का एक विशेष 'एग्रोनॉमिक उपयोग' भी है। जब खेतों में जंगली धान (जिसे स्थानीय भाषा में 'पसही' कहते हैं) की समस्या बढ़ जाती है, तब किसान भाटाफूल की बुवाई करते हैं। भाटाफूल की बालियां बैगनी रंग की होती हैं, जिससे खेत में उगे जंगली धान (पसही) को पहचानना और छांटकर बाहर निकालना बहुत आसान हो जाता है। यह जैविक तरीके से खेत को जंगली धान से मुक्त करने का एक बेहतरीन उपाय है।

⚠️ संरक्षण की दरकार: हाइब्रिड के दौर में संकट

भाटाफूल 120 से 135 दिन की फसल है। शहडोल के बुढार, गोहपारू और सोहागपुर ब्लॉक के कुछ चुनिंदा किसानों के पास ही अब इसका बीज बचा है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. मृगेंद्र सिंह चिंता व्यक्त करते हैं कि कम उत्पादन के कारण किसान अब हाइब्रिड किस्मों की ओर भाग रहे हैं, जिससे भाटाफूल जैसी अमूल्य देसी वैरायटी विलुप्त होने की कगार पर है। इसे भविष्य के लिए सहेजने और सरकारी स्तर पर संरक्षण की तत्काल आवश्यकता है।

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