बालाघाट में बच्चों की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग सतर्क, विशेष अभियान चलाकर 5 दिनों में लगाए 8,000 टीके
मध्य प्रदेश में खसरा (मीजल्स) के बढ़ते मामलों को लेकर स्वास्थ्य विभाग सतर्क है। भिंड, शिवपुरी और ग्वालियर में सबसे अधिक केस दर्ज किए गए हैं।
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में पिछले दो महीनों के दौरान बच्चों में मलेरिया और खसरा (मीजल्स) के संक्रमण से हुई मौतों के बाद स्वास्थ्य महकमा पूरी तरह हरकत में आ गया है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, बालाघाट इस वक्त खसरा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है, जहाँ अप्रैल से जुलाई के बीच 34 नए मामले सामने आए थे। हालांकि, अगर पूरे प्रदेश के आंकड़े देखें तो इससे भी ज्यादा चिंताजनक हालात ग्वालियर-चंबल संभाग में बने हुए हैं। चंबल अंचल के भिंड और शिवपुरी के बाद ग्वालियर में प्रदेश के कुल मामलों का लगभग एक तिहाई हिस्सा दर्ज किया गया है, जिसके बाद सरकार ने विशेष टीकाकरण अभियान तेज कर दिया है।
📊 मीजल्स के मामले में चंबल टॉप पर: भिंड में 123 और शिवपुरी में 81 केस दर्ज
मध्य प्रदेश में जनवरी से जुलाई 2026 के बीच बच्चों में खसरा के लगभग 1,407 मामले सामने आ चुके हैं। इस सूची में चंबल अंचल सबसे ऊपर है, क्योंकि अकेले भिंड जिले में सर्वाधिक 123 मामले दर्ज किए गए हैं। इसके बाद 81 मामलों के साथ शिवपुरी दूसरे और 80 मामलों के साथ ग्वालियर तीसरे स्थान पर है। राजधानी भोपाल इस मामले में चौथे नंबर पर है, जहाँ इस साल 73 केस रिपोर्ट हुए हैं। हालांकि, भिंड के जिला टीकाकरण अधिकारी डॉ. गौरव भटनागर का कहना है कि पिछले तीन महीनों से जिले में एक भी नया मामला सामने नहीं आया है, और जो केस मिले हैं वे संभवतः कोविड काल के दौरान टीकाकरण से छूट गए बच्चों के हैं, जिन्हें अब 'कैचअप ड्राइव' के जरिए कवर किया जा रहा है।
💉 बालाघाट में विशेष वैक्सीनेशन ड्राइव: आदिवासियों के पलायन के कारण ट्रैकिंग बनी चुनौती
बालाघाट में पिछले दिनों खसरा और मलेरिया से बच्चों की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए नए टीकाकरण अधिकारी के रूप में डॉ. पारितोष शुक्ला को जिम्मेदारी सौंपी है। विभाग द्वारा चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत पिछले पांच दिनों में 8,000 से अधिक बच्चों को खसरा के टीके लगाए जा चुके हैं। स्वास्थ्य अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यहाँ रहने वाले गोंड और बैगा आदिवासी समुदाय के लोग साल में तीन बार खेती और मजदूरी के सिलसिले में अन्य शहरों व राज्यों में पलायन करते हैं, जिससे उनकी नियमित ट्रैकिंग करना काफी कठिन होता है। इसके बावजूद विशेष शिविरों के माध्यम से बच्चों का टीकाकरण सुनिश्चित किया जा रहा है।
⚠️ बच्चों के लिए कितना खतरनाक है खसरा? समय पर बचाव और पहचान है जरूरी
चिकित्सकों के अनुसार, भारत में खसरा से बचाव के लिए एमआर (Measles-Rubella) के दो टीके लगाए जाते हैं—पहला जन्म से 9-12 महीने के बीच और दूसरा 16-24 महीने की उम्र में। खसरा के संक्रमण से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) अत्यधिक कमजोर हो जाती है, जिससे उन्हें निमोनिया, मस्तिष्क का संक्रमण, उल्टी-दस्त, कान का इंफेक्शन और अंधापन जैसी गंभीर बीमारियां घेर सकती हैं। शरीर पर लाल चकत्ते इस संक्रमण की मुख्य पहचान हैं। यह बीमारी तेजी से फैलती है, इसलिए समय पर इलाज और संक्रमित बच्चे को अन्य बच्चों से अलग (आइसोलेट) रखना बेहद आवश्यक है।
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