रक्षाबंधन पर दिव्यांग बहनों ने बांधी अनोखी 'बीज वाली राखी', पर्यावरण संरक्षण का दिया अनूठा संदेश
छिंदवाड़ा के CWSN दिव्यांग छात्रावास में बहनों ने भाइयों को बीज वाली राखी बांधी है। पर्यावरण संरक्षण का यह अनोखा संदेश सोशल मीडिया पर भी काफी पसंद किया जा रहा है।
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में रक्षाबंधन का पर्व इस बार बेहद अनूठे और प्रेरणादायक अंदाज में मनाया गया। यहाँ के CWSN दिव्यांग छात्रावास में दिव्यांग बहनों ने भाइयों की कलाइयों पर सिर्फ अपनी रक्षा का पारंपरिक वचन ही नहीं लिया, बल्कि उनसे पर्यावरण की सुरक्षा करने का भी संकल्प लिया। स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से यहाँ पहुंची इन बेटियों ने भाइयों को ऐसी विशेष राखियां बांधी जो हाथ से उतरने या जमीन पर गिरने के बाद पौधों का रूप ले लेंगी और धरती को हरा-भरा करने में मदद करेंगी।
🌿 सीड बॉल तकनीक से प्रेरित: राखी के बीजों से अंकुरित होंगे लाभकारी पेड़
भाइयों की कलाई पर 'सीड वाली राखी' बांधकर इन दिव्यांग बहनों ने समाज को पर्यावरण बचाने का एक बेहतरीन संदेश दिया है। इन अनोखी राखियों को बनाते समय इनमें विभिन्न प्रकार के लाभकारी और छायादार वृक्षों के बीज डाले गए हैं। जब ये राखियां त्योहार के बाद हाथों से छूटकर जमीन पर गिरेंगी या मिट्टी के संपर्क में आएंगी, तो नमी पाकर इनमें से पौधों का अंकुरण शुरू हो जाएगा, जो आगे चलकर पेड़ बनकर पर्यावरण की रक्षा करेंगे।
🌍 क्या होती है सीड बॉल टेक्निक? पक्षियों और जानवरों से बीजों की सुरक्षा
जिस सीड बॉल (Seed Ball) तकनीक से प्रेरित होकर यह राखियां तैयार की गई हैं, वह पर्यावरण संरक्षण की एक बेहद कारगर विधि है। सीड बॉल मूल रूप से मिट्टी, खाद और विभिन्न पेड़ों के बीजों को आपस में मिलाकर बनाई गई छोटी गोलियां होती हैं। इन्हें मानसून से पहले तैयार कर वीरान या बंजर जगहों पर फेंक दिया जाता है, जहाँ बारिश का पानी मिलते ही बीज अंकुरित हो जाते हैं। इन्हें मिट्टी में लपेटकर इसलिए बनाया जाता है ताकि पक्षी या अन्य जीव इन बीजों को खा न सकें और वे सुरक्षित रहें।
🤝 स्व सहायता समूह की महिलाओं को मिला रोजगार और वोकल फॉर लोकल को बढ़ावा
छिंदवाड़ा में 'वोकल फॉर लोकल' अभियान के तहत स्व सहायता समूह की महिलाओं और युवतियों ने अपने हाथों से इन इको-फ्रेंडली राखियों का निर्माण किया है। रोटरी क्लब छिंदवाड़ा के सदस्य विनोद तिवारी ने बताया कि स्थानीय महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से यह पहल की गई है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में भले ही ये राखियां दिखने में बहुत ज्यादा चमकीली या आधुनिक न लगें, लेकिन इनका पर्यावरणीय महत्व बहुत अधिक है। रोटरी क्लब और अन्य सामाजिक संस्थाओं ने इन समूहों से राखियां खरीदकर स्कूलों और छात्रावासों में वितरित कीं, ताकि भाई-बहन के इस पावन पर्व पर प्रकृति प्रेम का संदेश दूर-दूर तक पहुंच सके।
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