छिंदवाड़ा में पारंपरिक पर्व 'भुजलिया' की धूम, गेहूं के उगने से किसान लगाते हैं फसल का अनुमान

मध्य प्रदेश में रक्षाबंधन के आसपास मनाए जाने वाले पारंपरिक पर्व 'भुजलिया' से किसान आने वाली फसल का अंदाजा लगाते हैं। जानिए इस परंपरा का इतिहास।

Aug 28, 2026 - 15:36
0
छिंदवाड़ा में पारंपरिक पर्व 'भुजलिया' की धूम, गेहूं के उगने से किसान लगाते हैं फसल का अनुमान

मध्य प्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में सदियों से चली आ रही परंपराएं आज भी लोगों की जीवनशैली और आस्था का अहम हिस्सा बनी हुई हैं। ऐसी ही एक अनूठी परंपरा है 'भुजलिया' पर्व, जिसे कई जगहों पर 'भुजरिया' या 'कजलिया' के नाम से भी जाना जाता है। रक्षाबंधन और उसके आसपास के दिनों में मनाए जाने वाले इस त्योहार को लेकर लोगों में गहरी आस्था है। मान्यता है कि भुजलिया के पौधों की लंबाई और चमक देखकर किसान यह आसानी से अंदाजा लगा लेते हैं कि आने वाले समय में खेती कितनी फायदेमंद या नुकसानदायक साबित होगी।

🍃 पलाश के दोनों में 7-8 दिनों तक अंधेरे में उगाए जाते हैं गेहूं के दाने

मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से मनाए जाने वाले इस पर्व की शुरुआत छिंदवाड़ा में रक्षाबंधन से पहले शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन होती है। इस दौरान पलाश (ढाक) के पत्तों से बने दोनों में उपजाऊ मिट्टी भरकर उसमें गेहूं के दाने बोए जाते हैं और फिर इन्हें किसी अंधेरे स्थान पर रख दिया जाता है। चौरई शासकीय महाविद्यालय के वनस्पति शास्त्र विशेषज्ञ डॉ. विकास शर्मा बताते हैं कि किसान इन दोनों को एक प्रकार से छोटा खेत मानते हैं। इन दोनों में आठ दिनों तक नियमित रूप से पानी दिया जाता है, और रक्षाबंधन के दिन इनकी विशेष पूजा की जाती है। गेहूं के पौधे जितने लंबे और चमकदार पीले होते हैं, फसल उतनी ही अच्छी होने का अनुमान लगाया जाता है।

📜 वीरता और भाईचारे का प्रतीक है भुजलिया, आल्हा-ऊदल के इतिहास से जुड़ी है कथा

विशेषज्ञों के अनुसार, भुजलिया मुख्य रूप से रक्षाबंधन के ठीक अगले दिन मनाया जाने वाला पारंपरिक उत्सव है। इसकी शुरुआत षष्ठी तिथि (नागपंचमी के अगले दिन) से होती है, जिसमें खेतों की मिट्टी लाकर पलाश या माहुल के पत्तों के दोनों में गेहूं बोया जाता है। बांस की बड़ी टोकरी को उल्टा करके और उस पर कपड़ा डालकर अंधेरा वातावरण तैयार किया जाता है। परिवार के सदस्यों की संख्या के अनुसार दोनों की संख्या तय होती है। बुजुर्गों का मानना है कि ऐतिहासिक काल में आल्हा-ऊदल और महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना के बीच हुए युद्ध के बाद से इस पर्व को रक्षाबंधन के अगले दिन मनाने की परंपरा शुरू हुई, जो वीरता और आपसी भाईचारे का प्रतीक है।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User