भोपाल में पीडब्ल्यूडी का बड़ा खेल, 74 लाख के बजट में कागजों पर बना डिवाइडर और जमीन पर काम अधूरा
भोपाल में पीडब्ल्यूडी के सड़क निर्माण कार्य में बड़ा भ्रष्टाचार सामने आया है। 74 लाख रुपये मंजूर होने के बावजूद कागजों में काम पूरा दिखा 150 मीटर ही डिवाइडर बना है।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की सड़कों पर हादसों को रोकने के नाम पर सरकारी खजाने के दुरुपयोग का एक बड़ा मामला सामने आया है। शहर के व्यस्त व्यापम चौराहे से नूतन कॉलेज के बीच दुर्घटना संभावित ब्लैक स्पॉट को खत्म करने के लिए लोक निर्माण विभाग (PWD) द्वारा कुल 74.40 लाख रुपये का भारी-भरकम बजट मंजूर किया गया था। हैरानी की बात यह है कि विभागीय दस्तावेजों और रिकॉर्ड में 600 मीटर लंबे डिवाइडर का निर्माण 100 प्रतिशत पूरा दिखाकर पूरा भुगतान भी कर दिया गया, लेकिन जब मौके पर जमीनी हकीकत देखी गई तो वहाँ महज 100 से 150 मीटर का ही काम हुआ मिला। कागजों में विकास कार्य को पूर्ण बताकर जनता के गाढ़े पसीने की कमाई की खुलेआम बर्बादी की गई है।
⚠️ रसूखदारों के दबाव में रुका काम, जस का तस बना हुआ है हादसों का खतरा
भ्रष्टाचार की इस पूरी दास्तान का दायरा सरोजिनी नायडू कॉलेज स्थित भगिनी निवेदिता प्रतिमा से लेकर छह नंबर रोड स्थित विधायक कार्यालय तक ही सिमट कर रह गया है। विभागीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इसके आगे डिवाइडर बनाने का काम शहर के कुछ रसूखदार लोगों और नेताओं के दबाव के चलते बीच में ही रुकवा दिया गया। नतीजतन, जिस ब्लैक स्पॉट को पूरी तरह खत्म करने के उद्देश्य से 74 लाख रुपये से अधिक की राशि फूंकी गई, वहाँ आज भी स्थिति जस की तस बनी हुई है और राहगीरों के लिए हादसों का खतरा पहले की तरह बरकरार है। बिना किसी ठोस प्लानिंग के मनमाने तरीके से किए गए इन निर्माण कार्यों ने इंजीनियरों और ठेकेदारों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
📑 बिना प्लानिंग के डिवाइडर बनाकर तुड़वाया, फाइलों में दर्ज कर दी गई 100 प्रतिशत भौतिक प्रगति
पीडब्ल्यूडी के इंजीनियरों की अदूरदर्शिता का आलम यह रहा कि व्यापम चौराहे से नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग (UADD) कार्यालय के ठीक सामने पहले तो जल्दबाजी में डिवाइडर का निर्माण कर दिया गया, और फिर कुछ ही दिनों के भीतर उसे बुलडोजर से तुड़वाकर सड़क को वापस पुरानी स्थिति में लाया गया। स्थानीय दुकानदारों और रहवासियों का कहना है कि जब इस हिस्से के डिवाइडर को अंततः तुड़वाना ही था, तो आखिर किसकी सहमति और इशारे पर जनता के लाखों रुपये पानी की तरह बहाए गए। विभाग द्वारा जारी टाइमलाइन के मुताबिक 1 अगस्त 2025 को स्वीकृति मिलने और 11 फरवरी 2026 को वर्क ऑर्डर जारी होने के बाद 30 जून 2026 तक काम पूरा दिखाने के लिए कागजों में 0.60 किमी की भौतिक प्रगति दर्ज कर ली गई, जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। हालांकि, मामले के तूल पकड़ने के बाद अब विभाग द्वारा दोबारा सर्वे कराए जाने की बात कही जा रही है।
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