गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों के लिए वरदान साबित हो रही सैम प्रणाली, बच्चों को मिल रहा नया जीवन
विदिशा जिला अस्पताल में इंटीग्रेटेड सैम मैनेजमेंट के जरिए पिछले 4 महीनों में 229 कुपोषित बच्चों का सफल इलाज किया गया है। बच्चों को विशेष आहार और परिजनों को आर्थिक सहायता मिल रही है।
मध्य प्रदेश में कुपोषण के खात्मे के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही मुहिम के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की पहचान कर उनके समय पर उपचार और देखभाल के लिए 'इंटीग्रेटेड सैम मैनेजमेंट' (Integrated SAM Management) की प्रणाली अपनाई जा रही है, जिसके जरिए विदिशा जिला अस्पताल में बीते महज 4 महीनों के भीतर 229 कुपोषित बच्चों का सफल इलाज किया गया है। इस आधुनिक प्रणाली से न केवल बच्चों की सेहत में तेजी से सुधार हो रहा है, बल्कि बाल मृत्यु दर को कम करने में भी बहुत बड़ी मदद मिल रही है।
🏥 जिला अस्पताल में सैम सिस्टम की व्यवस्था, पीडियाट्रिक वार्ड और एनआरसी में दी जाती है विशेष देखरेख
विदिशा के श्रीमंत माधवराव सिंधिया जिला चिकित्सालय में गंभीर तीव्र कुपोषण (SAM) से जूझ रहे बच्चों के लिए यह विशेष व्यवस्था लागू की गई है। शिशु विभाग प्रभारी डॉ. प्रमोद मिश्रा के अनुसार, जब कोई अति कुपोषित बच्चा अस्पताल पहुँचता है, तो उसकी शारीरिक स्थिति के आधार पर उसे पीडियाट्रिक वार्ड या आईसीयू में भर्ती किया जाता है। यहाँ बुखार, दस्त, डिहाइड्रेशन या सांस से जुड़ी अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का तुरंत उपचार किया जाता है। इसके बाद बच्चे को पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) में शिफ्ट कर दिया जाता है, जहाँ तय प्रोटोकॉल के तहत वजन, लंबाई और एमयूएसी की माप लेकर उसकी नियमित मॉनिटरिंग की जाती है।
🍼 बच्चों को दिन में 8 बार मिलता है पौष्टिक आहार, परिजनों को प्रतिदिन 120 रुपये की आर्थिक सहायता
पोषण पुनर्वास केंद्र में 14 दिन के प्रवास के दौरान बच्चों के खान-पान का विशेष ख्याल रखा जाता है। उन्हें दिन में 8 बार पौष्टिक आहार—जैसे दूध, हलवा और केला—दिया जाता है। इसके साथ ही, शासन की ओर से अस्पताल में रहने के दौरान परिजनों के मजदूरी के नुकसान की भरपाई के लिए 'वेज कॉम्पन्सेशन' के रूप में 120 रुपये प्रतिदिन की आर्थिक सहायता भी दी जाती है। डिस्चार्ज से पहले बच्चों का टीकाकरण पूरा कराया जाता है और घर लौटने के बाद अगले दो महीनों तक हर 15 दिन में कुल 4 बार फॉलोअप लिया जाता है, जिससे बच्चों को कुपोषण के चंगुल से पूरी तरह सुरक्षित बाहर निकाला जा सके।
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