ओल्ड मोंक रम विवाद: FSSAI के खुलासे के बाद भारत में शराब की क्वालिटी और लेबलिंग पर उठे बड़े सवाल
FSSAI और बॉम्बे हाई कोर्ट में ओल्ड मोंक को लेकर उठे विवाद के बाद भारतीय शराब बाजार में ENA, लेबलिंग और कंज्यूमर राइट्स को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है।
भारत में शराब की बोतल पर लिखा नाम जैसे व्हिस्की, रम या वोडका अब केवल ब्रांड का नाम नहीं बल्कि कानूनी बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। हाल ही में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने बॉम्बे हाई कोर्ट में स्पष्ट किया कि लोकप्रिय ब्रांड ओल्ड मोंक को कानूनी तौर पर 'रम' नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें आर्टिफिशियल फ्लेवर वाले न्यूट्रल स्पिरिट का इस्तेमाल होता है। केवल ओल्ड मोंक ही नहीं, बल्कि गोल्ड रिजर्व और मैकडॉवेल्स नंबर 1 जैसे कई बड़े ब्रांड्स भी जांच के घेरे में आ गए हैं। इस पूरे विवाद ने देश की IMFL (इंडियन मेड फॉरेन लिकर) इंडस्ट्री और कंज्यूमर के अधिकारों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
📋 व्हिस्की, रम और वोडका के नियम—क्या भारत में ENA का इस्तेमाल है मिलावट?
शराब के वर्गीकरण (Classification) और उसमें इस्तेमाल होने वाले एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल (ENA) को लेकर FSSAI के कड़े नियम हैं। जानकारों के मुताबिक, ENA का इस्तेमाल अपने आप में मिलावट नहीं है, बशर्ते यह तय रेगुलेटरी स्टैंडर्ड्स के मुताबिक किया गया हो। हालांकि, असली विवाद फ्लेवरिंग और लेबल पर किए जाने वाले दावों को लेकर है। ओल्ड मोंक मामले में कंपनी ने अदालत में अपने लेबल से '7 Years Old Blended' शब्द हटाने और एडेड फ्लेवर को स्पष्ट रूप से दिखाने पर सहमति जताई है। इस पूरी चर्चा का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ता जो पैसा खर्च कर रहे हैं, उन्हें बोतल पर लिखे दावों और उसकी असल सामग्री की पूरी और सटीक जानकारी मिले।
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