उज्जैन के श्रीराम घाट पर स्थित है सिंधिया वंश के संस्थापक राणोजी की ऐतिहासिक छतरी, जानिए इसका इतिहास
उज्जैन के श्रीराम घाट पर बनी राणोजी सिंधिया की ऐतिहासिक छतरी मराठा और राजस्थानी वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। यह स्मारक मालवा में सिंधिया वंश के इतिहास को समेटे हुए है।
दुनियाभर में बाबा महाकाल के धाम और भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली के रूप में विख्यात उज्जैन में इतिहास के कई अनछुए पहलू दबे हुए हैं। शहर की शिप्रा नदी के श्रीराम घाट पर खड़ी एक ऐतिहासिक छतरी उज्जैन के उस गौरवशाली दौर की कहानी बयां करती है, जब 18वीं शताब्दी में मालवा की राजनीति में मराठा शक्ति तेजी से उभर रही थी। यह स्मारक किसी आम राजवंशीय छतरी से कहीं बढ़कर है; यह राणोजी सिंधिया की स्मृति से जुड़ी है, जिन्होंने मालवा में सिंधिया सत्ता की मजबूत नींव रखी और साल 1731 में उज्जैन को अपना प्रमुख राजनीतिक सत्ता केंद्र बनाया था।
🎨 राजस्थानी और मराठा वास्तुकला का बेजोड़ संगम, 1810 तक ग्वालियर ले जाए जाने से पहले उज्जैन था सिंधिया वंश की राजधानी
इतिहासकारों और पुराविदों के अनुसार, वर्ष 1810 में दौलतराव सिंधिया द्वारा राजधानी को ग्वालियर ले जाने से पहले तक उज्जैन का राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्व सर्वोपरि था। पद्म श्री सम्मानित डॉ. भगवती लाल राज पुरोहित बताते हैं कि शिप्रा तट पर बनी इस ऐतिहासिक छतरी को राणोजी के पुत्र जयप्पाजी राव सिंधिया ने बनवाया था। सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के पुराविद् प्रो. डॉ. रमण सोलंकी के मुताबिक, लाल बलुआ पत्थर पर की गई अत्यंत बारीक नक्काशी, सजावटी स्तंभ और बेल-बूटेदार आकृतियां इस छतरी को बेहद खास बनाती हैं। इसमें राजपूत और मराठा स्थापत्य कला का सुंदर मेल देखने को मिलता है। इसके अलावा शाजापुर के शुजालपुर स्थित राणोगंज में भी राणोजी की स्मृतियां जुड़ी हैं, जो मराठा साम्राज्य के विस्तार के इतिहास को मजबूती से दर्शाती हैं।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)