धान की खेती से पर्यावरण को बड़ा नुकसान: आईसर भोपाल की रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा, बढ़ सकती है मीथेन

आईसर भोपाल और IRRI के शोध में खुलासा हुआ है कि भारत के धान के खेत हर साल 97 लाख टन मीथेन गैस वातावरण में छोड़ रहे हैं, जिससे ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ रही है। पूरी खबर पढ़ें।

Sep 11, 2026 - 12:16
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धान की खेती से पर्यावरण को बड़ा नुकसान: आईसर भोपाल की रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा, बढ़ सकती है मीथेन

भोपाल। आपकी प्लेट में रखा चावल धान के जिन खेतों से आता है, वे न सिर्फ जहरीली मीथेन गैस वातावरण में छोड़ते हैं बल्कि इससे ग्लोबल वॉर्मिंग भी बढ़ रही है। आईसर (IISER) भोपाल और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI) के वैज्ञानिकों ने पर्यावरण को लेकर एक रिसर्च लेटर प्रकाशित किया है। उनके इस शोध में जो बात सामने आई है, वह बेहद चौंकाने वाली है।

🛰️ हर साल 97 लाख टन मीथेन गैस छोड़ रहे धान के खेत, सैटेलाइट डेटा से हुआ खुलासा

देश के पानी से भरे धान के खेत, जो दुनिया की एक बड़ी आबादी का पेट भर रहे हैं, वे हर साल पर्यावरण में करीब 97 लाख टन मीथेन गैस छोड़ रहे हैं। कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में मीथेन गैस वातावरण में कम समय तक रहती है, लेकिन यह अपने अंदर अत्यधिक गर्मी को रोके रखती है। दोनों संस्थानों के वैज्ञानिकों ने इसके अध्ययन के लिए यूरोप कॉपरनिकस प्रोग्राम के सैटेलाइट डेटा का उपयोग किया। इसमें 10 मीटर रिजॉल्यूशन पर धान के खेतों का नक्शा तैयार किया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि मीथेन गैस का उत्सर्जन सबसे ज्यादा कहां और कब होता है।

🌧️ अकेले खरीफ फसल से निकलता है तीन-चौथाई मीथेन उत्सर्जन

शोध से जुड़े आईसर के वैज्ञानिकों के अनुसार, अकेले मॉनसून के मौसम में बोई जाने वाली खरीफ फसल से ही देश में चावल से जुड़ी मीथेन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा निकलता है। देश के ज्यादातर इलाकों में चावल खाने का मुख्य हिस्सा है, लेकिन यही खेती अब जलवायु परिवर्तन पर पड़ने वाले दुष्परिणामों का एक बड़ा कारण बनकर सामने आई है।

🦠 पानी भरे खेतों में ऑक्सीजन की कमी और सूक्ष्मजीव हैं मुख्य वजह

धान की फसल पानी से लबालब भरे खेतों में उगाई जाती है, जिसके कारण मिट्टी में ऑक्सीजन की भारी कमी हो जाती है। ऐसी स्थिति में वहां मौजूद सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को सड़ाकर मीथेन गैस उत्पन्न करते हैं। यह पारंपरिक कृषि प्रक्रिया बहुत पुरानी है, लेकिन इससे पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। देश में लगभग चार करोड़ हेक्टेयर जमीन पर चावल की खेती की जाती है, जो लोगों की आजीविका का साधन होने के साथ-साथ पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा रही है।

⚠️ भविष्य में 25 प्रतिशत तक बढ़ सकता है मीथेन का उत्सर्जन

शोध में चेतावनी दी गई है कि यदि आने वाले समय में वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी होती है और बारिश का चक्र बिगड़ता है, तो मीथेन गैस के उत्सर्जन में 25 प्रतिशत तक का इजाफा हो सकता है। इससे न केवल पर्यावरण बल्कि कृषि पैदावार और किसानों की आजीविका पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस विषय पर व्यापक स्तर पर और अधिक शोध व नीतिगत उपायों की आवश्यकता है।

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