सम्राट अशोक कालीन वैश्य टेकरी का 90 साल बाद अध्ययन, जमीन में 50 फीट नीचे की मिलेगी जानकारी
उज्जैन स्थित सम्राट अशोक कालीन वैश्य टेकरी स्तूप के रहस्यों का खुलासा करने के लिए MANIT रडार तकनीक (GPR) से अध्ययन करेगा। 90 साल बाद फिर शुरू होगी प्रक्रिया।
भोपाल। धार्मिक और ऐतिहासिक नगरी उज्जैन स्थित अशोककालीन 'वैश्य टेकरी' में लगभग 90 साल के लंबे अंतराल के बाद इतिहास की परतें दोबारा खोलने की तैयारी की जा रही है।
इस बार मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MANIT, भोपाल) भी इसके वैज्ञानिक अध्ययन और अनुसंधान में शामिल होगा। मैनिट की विशेषज्ञ टीम जमीन में बिना किसी प्रकार की खुदाई किए अत्याधुनिक रडार तकनीक के माध्यम से यह पता लगाने का प्रयास करेगी कि सतह के नीचे प्राचीन समय की क्या ठोस संरचनाएं मौजूद हैं। इस रडार सर्वे से जमीन में करीब 50 फीट गहराई तक की स्थिति के संकेत मिलने की उम्मीद है, जिससे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को आगे की सटीक खुदाई और संरक्षण की रूपरेखा तैयार करने में सीधी मदद मिलेगी।
🛕 सांची के विश्व प्रसिद्ध स्तूप से भी बड़ा माना जाता है यह स्तूप: सम्राट अशोक ने पत्नी 'देवी' की याद में कराया था निर्माण
उज्जैन स्थित वैश्य टेकरी का पुरातात्विक महत्व इसलिए भी अत्यधिक बढ़ जाता है, क्योंकि यहाँ स्थित बौद्ध स्तूप का आकार सांची के मुख्य स्तूप से भी विशाल माना गया है।
इतिहासकारों और विद्वानों के अनुसार, जब सम्राट अशोक उज्जैन के प्रांतीय गवर्नर (राज्यपाल) थे, तब उन्होंने अपनी पत्नी देवी की स्मृति में इस विशाल स्तूप का निर्माण करवाया था। वर्ष 1938-39 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई शुरुआती खुदाई के दस्तावेजों के मुताबिक, यहाँ से बड़े आकार की प्राचीन ईंटें और पंच-चिह्नित (Punch-marked) ऐतिहासिक सिक्के बरामद हुए थे। उस समय किए गए सर्वे में इस स्तूप के आधार का व्यास लगभग 350 फीट और ऊंचाई कम से कम 100 फीट आंकी गई थी, जबकि सांची के मुख्य स्तूप की ऊंचाई लगभग 54 फीट है।
💨 ब्रिटिश काल में विषैली गैस रिसाव के कारण रुका था खुदाई का काम: अब 'बुद्ध लोक' के रूप में विकसित करने की योजना
उल्लेखनीय है कि वर्ष 1938 में ब्रिटिश काल के दौरान यहाँ खुदाई का काम शुरू किया गया था और कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष प्राप्त भी हुए थे, लेकिन खुदाई के दौरान अचानक विषैली गैसों का रिसाव होने के कारण काम को सुरक्षा कारणों से बीच में ही रोकना पड़ा था।
अब एएसआई (ASI) भोपाल मंडल ने इस ऐतिहासिक स्थल के वैज्ञानिक संरक्षण और नए सिरे से खुदाई का विस्तृत प्रस्ताव अपने दिल्ली स्थित केंद्रीय मुख्यालय को भेजा है। एएसआई भोपाल मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. शिवाकांत वाजपेयी के अनुसार, खुदाई के बाद ही वास्तविक ऐतिहासिक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। वहीं, राज्य सरकार इस स्थल की पुरातात्विक प्रासंगिकता को देखते हुए इसे 'बुद्ध लोक' के रूप में भव्यता से विकसित करने की योजना बना रही है। पुरातत्व संचालनालय एवं अभिलेखागार आयुक्त मदन कुमार नागरगोजे ने बताया कि रडार सर्वे के लिए मैनिट प्रबंधन से वार्ता हो चुकी है और एएसआई की औपचारिक अनुमति मिलते ही जांच प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।
🛰️ जानिए कैसे काम करती है भू-भेदी रडार (GPR) तकनीक: बिना खुदाई के जमीन के भीतर का पता लगाएगा विज्ञान
ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) को हिंदी में 'भू-भेदी रडार' कहा जाता है। यह एक अत्यंत आधुनिक और गैर-विनाशकारी वैज्ञानिक तकनीक है, जिसकी मदद से जमीन को खोदे बिना उसके भीतर छिपी ऐतिहासिक और प्राकृतिक संरचनाओं का सटीक खाका तैयार किया जा सकता है।
इस प्रक्रिया में रडार उपकरण को जमीन की ऊपरी सतह पर धीरे-धीरे चलाया जाता है, जहाँ से उच्च आवृत्ति की विद्युत चुंबकीय तरंगें (Electromagnetic Waves) जमीन के भीतर गहराई तक भेजी जाती हैं। जमीन के नीचे मौजूद अलग-अलग पदार्थ—जैसे मिट्टी, चट्टानें, प्राचीन ईंटें, खोखली जगहें या कोई ठोस निर्माण—इन तरंगों को अलग-अलग गति और कोण से वापस परावर्तित करते हैं। रडार इन लौटकर आने वाले संकेतों को दर्ज करता है, जिसके बाद कंप्यूटर सॉफ्टवेयर के जरिए इन आंकड़ों का विश्लेषण करके यह सटीक अनुमान लगाया जाता है कि किस स्थान पर और कितनी गहराई में ऐतिहासिक अवशेष या इमारतें मौजूद हैं।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)