मध्य प्रदेश में हिंदी मीडियम से डॉक्टरी की पढ़ाई का प्रयोग पड़ा सुस्त, जानें कुलपति का बयान
मध्य प्रदेश में हिंदी में MBBS की पढ़ाई का प्रयोग सफल नहीं हो पा रहा है। करोड़ों खर्च के बावजूद 10% से भी कम छात्रों ने चुनी हिंदी/मिक्स भाषा।
जबलपुर। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा एमबीबीएस (MBBS) की पढ़ाई हिंदी माध्यम में कराने की महत्वाकांक्षी योजना को छात्रों से अपेक्षित प्रतिसाद नहीं मिल पा रहा है।
अनेक हिंदी अनुवादित पुस्तकें और अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराए जाने के बावजूद 10 प्रतिशत से भी कम छात्रों ने हिंदी या मिक्स (हिंदी-अंग्रेजी) भाषा में परीक्षाएं दी हैं। हालांकि, जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति का मानना है कि यह एक नया और ऐतिहासिक प्रयोग है, जिसकी स्वीकार्यता में धीरे-धीरे वृद्धि होगी।
🏛️ वर्ष 2022 में हुई थी ऐतिहासिक घोषणा: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने किया था शुभारंभ
उल्लेखनीय है कि देश में मेडिकल की पढ़ाई प्रारंभ से ही केवल अंग्रेजी माध्यम में संचालित होती रही है, लेकिन मध्य प्रदेश पहला ऐसा राज्य बना जिसने इसे हिंदी में शुरू करने की पहल की थी।
26 जनवरी 2022 को तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर इसकी घोषणा की थी। तत्पश्चात, 16 अक्टूबर 2022 को भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने औपचारिक रूप से हिंदी में एमबीबीएस पाठ्यक्रम का शुभारंभ किया था। इस प्रोजेक्ट के लिए सरकार ने लगभग ₹10 करोड़ खर्च किए, जिसमें 100 से अधिक डॉक्टरों की टीम ने 3 साल तक मेहनत करके 50,000 से अधिक पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया था।
📚 10 प्रतिशत छात्र ही ले रहे हिंदी का सहारा: छात्रों को मिल रही है सहायता
मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (जबलपुर) के कुलगुरु (कुलपति) डॉ. अशोक खंडेलवाल ने बताया कि "चिकित्सा शिक्षा के इतिहास में हिंदी माध्यम की शुरुआत अपने आप में पहला अनूठा प्रयास था।
यद्यपि जितना प्रतिसाद मिलने की उम्मीद थी उतना नहीं मिला है, परंतु अब भी करीब 10 प्रतिशत छात्र हिंदी व मिक्स लैंग्वेज का उपयोग कर रहे हैं। विशेषकर जिन विद्यार्थियों की स्कूली शिक्षा हिंदी में हुई थी और जिनकी अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ नहीं थी, उन्हें इन पुस्तकों से काफी मदद मिल रही है।"
🤝 मरीजों के साथ संवाद में मिलेगा लाभ: स्वीकार्यता में लग सकता है लंबा समय
कुलपति डॉ. अशोक खंडेलवाल के अनुसार हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने वाले डॉक्टरों का सीधा लाभ मरीजों को मिलेगा, क्योंकि वे मरीजों से उनकी मातृभाषा में सहजता से संवाद स्थापित कर सकेंगे।
हालांकि, वे यह स्वीकार करते हैं कि हिंदी माध्यम को पूर्ण रूप से स्वीकार किए जाने में 30 से 40 वर्ष का समय लग सकता है। वहीं मेडिकल यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार डॉ. पुष्पराज बघेल ने स्पष्ट किया कि छात्रों ने पूरी तरह से हिंदी में उत्तर नहीं लिखे हैं, लेकिन मिक्स लैंग्वेज (हिंग्लिश) में उत्तर देने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है।
📊 नीट परीक्षा में भी अंग्रेजी का दबदबा: करोड़ों के खर्च के बाद भी मांग में कमी
आंकड़ों पर नज़र डालें तो वर्ष 2025 की नीट (NEET) परीक्षा में शामिल हुए 18 लाख 22 हजार अभ्यर्थियों में से मात्र 3 लाख 29 हजार छात्रों ने ही हिंदी माध्यम का चयन किया था।
चिकित्सा शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल कॉलेजों में विद्यार्थियों की ओर से कभी पृथक से हिंदी माध्यम की मांग नहीं की गई थी, फिर भी शासन ने करोड़ों रुपये व्यय कर यह व्यवस्था लागू की। वास्तविक समस्या शिक्षण के माध्यम की नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर स्कूली शिक्षा के ढांचे और अंग्रेजी भाषा के प्रति व्यावहारिक रुझान की है।
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