संघर्ष से सफलता तक; जानिए सागर की पहली महिला DSP और रिटायर्ड DIG सविता सोहाने की प्रेरणादायक कहानी

सागर की पहली महिला DSP और रिटायर्ड DIG सविता सोहाने की संघर्ष से भरी सफलता और सेवानिवृत्ति के बाद 5 राज्यों में जारी समाजसेवा की पूरी कहानी पढ़ें।

Sep 18, 2026 - 21:33
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संघर्ष से सफलता तक; जानिए सागर की पहली महिला DSP और रिटायर्ड DIG सविता सोहाने की प्रेरणादायक कहानी

सागर। संघर्षों से भरा जीवन, मुश्किलों व चुनौतियों से लड़कर MPPSC के जरिए DSP पद पर चयन और फिर मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में उत्कृष्ट सेवाएं। पुलिस ड्यूटी की जिम्मेदारियों के साथ-साथ समाजसेवा का जज्बा हमेशा कायम रहा। यह कहानी है सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) डीआईजी सविता सोहाने की। सेवानिवृत्ति के बाद अब वह जरूरतमंदों, अनाथों और असहायों की नई उम्मीद बनकर उभरी हैं। एक ट्रस्ट का गठन कर वह गरीब बेटियों की शिक्षा, मुफ्त कोचिंग और स्किल डेवलपमेंट के कई बड़े कार्यक्रम चला रही हैं।

📚 "जिंदगी का सफर नहीं था आसान": पिता के असमय निधन के बाद मां ने दिलाई उच्च शिक्षा

अपनी जीवन यात्रा को साझा करते हुए रिटायर्ड डीआईजी सविता सोहाने बताती हैं कि पिता के असमय निधन के बाद भी उनकी मां ने बेटियों की पढ़ाई में कभी कोई बाधा नहीं आने दी।

उनका परिवार मूल रूप से सिवनी जिले का रहने वाला है। उनके पिता स्वर्गीय शंकर लाल सोहाने मध्य प्रदेश राज्य परिवहन निगम में अधिकारी थे, जिनका संभाग स्तर पर तबादला होता रहता था। उनका जन्म भोपाल में हुआ, जबकि ग्वालियर, जबलपुर और रायपुर में स्कूली शिक्षा पूरी हुई। इसके बाद उच्च शिक्षा सागर गर्ल्स डिग्री कॉलेज और डॉ. हरीसिंह गौर यूनिवर्सिटी से हुई।

🏛️ सागर जिले की पहली महिला DSP बनने का गौरव: केसली में लेक्चरर से शुरू हुआ था प्रशासनिक सफर

सविता सोहाने का चयन सबसे पहले महिला एवं बाल विकास विभाग में सहायक अधिकारी के रूप में हुआ था। लगभग डेढ़ साल नौकरी करने के बाद मेरिट के आधार पर वह लेक्चरर बनीं और आदिवासी ब्लॉक केसली में अपनी सेवाएं दीं।

फरवरी 1994 में उनका चयन MPPSC के माध्यम से DSP पद पर हुआ। इस चयन के साथ ही उन्हें सागर जिले की पहली महिला DSP बनने का ऐतिहासिक गौरव हासिल हुआ।

🥋 अनुशासित परिवार और एनसीसी सी-सर्टिफिकेट: बुंदेलखंड के दौर में बनाई अपनी अलग पहचान

सविता सोहाने याद करती हैं, "1985-86 के दौर में बुंदेलखंड में लड़कियां अमूमन जींस और कुर्ता नहीं पहनती थीं, लेकिन मैं पहनती थी। परिवार में कड़ा अनुशासन था; पढ़ाई के लिए बाहर जाने की छूट थी, लेकिन शाम 6 बजे से पहले घर लौटना अनिवार्य था।"

उन्होंने छात्र जीवन में एनसीसी (NCC) ज्वाइन की और बेस्ट कैडेट बनकर सी-सर्टिफिकेट हासिल किया, जिसने उनके प्रशासनिक व अनुशासित व्यक्तित्व की मजबूत नींव रखी।

🤝 विरासत में मिले समाजसेवा के संस्कार: "पुलिस प्लेटफॉर्म से मिला जनसेवा का बड़ा अवसर"

पुलिस सेवा और समाजसेवा के समन्वय पर बात करते हुए वह बताती हैं, "जनसेवा ही पुलिस का मुख्य ध्येय होता है। इस पद से मुझे समाजसेवा का एक प्रामाणिक प्लेटफॉर्म मिला। इसके अलावा मुझे समाजसेवा के संस्कार विरासत में मिले थे।"

"मेरे पिता सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे और मां भी महिलाओं की सहायता, धार्मिक-सामाजिक आयोजन व गौ-सेवा जैसे कार्यों में हमेशा आगे रहती थीं।"

🏢 5 राज्यों में 87 जगहों पर सक्रिय है ट्रस्ट: 12 कोचिंग सेंटरों से अनाथ व दिव्यांग बेटियों को मिल रहा संबल

सेवानिवृत्ति के बाद सविता सोहाने का ट्रस्ट मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में कुल 87 स्थानों पर समाजसेवा की गतिविधियां संचालित कर रहा है।

वर्तमान में 12 कोचिंग इंस्टीट्यूट चल रहे हैं, जिन्हें अनाथ और दिव्यांग बेटियां संचालित कर रही हैं और उन्हें ट्रस्ट द्वारा मानदेय दिया जाता है। इन कोचिंगों में मजदूर व कामगार वर्ग के बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाने के साथ-साथ पर्सनालिटी और स्किल डेवलपमेंट का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

💡 बुंदेलखंड की बेटियों को खास संदेश: "शिक्षा और आत्म-अनुशासन ही सफलता की कुंजी"

बुंदेलखंड की युवा पीढ़ी और बेटियों को संदेश देते हुए सविता सोहाने कहती हैं, "अब बुंदेलखंड में बड़ा सकारात्मक बदलाव आया है। माहौल कैसा भी हो, आत्म-अनुशासन और घर से मिले संस्कार आपको हमेशा मजबूत बनाते हैं।"

"जब मैं केसली के इंटर कॉलेज में लेक्चरर बनकर गई थी, तब वहां केवल 1 लड़की पढ़ती थी। मैंने 4 सालों में ऐसा माहौल बनाया कि वहां 65 बेटियां पढ़ने लगीं। मेरा मानना है कि बेटियों को शिक्षित करना सबसे जरूरी है।"

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