मध्य प्रदेश में ग्राम सभाओं के वन अधिकारों पर लगा 'ब्रेक'; 200 गांवों के दावे अटके, सिर्फ 4 को मिली मंजूरी

मध्य प्रदेश में ग्राम सभाओं के सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) वन विभाग की मंजूरी के फेर में अटके। 200 गांवों के दावों के बीच टास्क फोर्स ने उठाए सवाल।

Sep 22, 2026 - 15:56
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मध्य प्रदेश में ग्राम सभाओं के वन अधिकारों पर लगा 'ब्रेक'; 200 गांवों के दावे अटके, सिर्फ 4 को मिली मंजूरी

भोपाल। मध्यप्रदेश में जंगल बचाने और उनका संरक्षण व प्रबंधन करने का अधिकार जिन ग्राम सभाओं को कानून ने दिया है, वही अधिकार अब वन विभाग की मंजूरी और लालफीताशाही के फेर में फंसता नजर आ रहा है। प्रदेश के करीब 27 हजार गांव सीएफआर (CFR - कम्यूनिटी फॉरेस्ट रिसोर्स/सामुदायिक वन संसाधन) अधिकार के दायरे में आ सकते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि अब तक केवल 4 गांवों को ही यह कानूनी अधिकार मिल सका है। वहीं, करीब 200 से अधिक गांव अपने वैध दावे जिला स्तर पर दाखिल कर चुके हैं। कई मामलों में स्थानीय स्तर पर सभी प्रक्रियाएं पूरी होने के बावजूद अधिकार पत्र जारी नहीं होने के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं।

📜 वन विभाग पर प्रक्रिया बाधित करने का आरोप: पीसीसीएफ कार्यालय के पत्र पर टास्क फोर्स ने उठाए सवाल

टास्क फोर्स के सदस्य मिलिंद थत्ते का आरोप है कि प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) कार्यालय की ओर से जारी एक पत्र में गांवों को सीएफआर अधिकार देने की आवश्यकता पर ही सवाल खड़े कर दिए गए हैं।

उनका कहना है कि यह पत्र 'वन अधिकार कानून' की मूल भावना के पूरी तरह विपरीत है और राज्य सरकार को इस पत्र को तत्काल प्रभाव से वापस लेना चाहिए। वहीं, टास्क फोर्स के एक अन्य सदस्य शरद चंद्र लेले ने कहा, "सीएफआर अधिकार मिलने के बाद जंगल के संरक्षण और प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी ग्राम सभा की होती है। वन विभाग को इसे अपनी शक्ति कम होने के रूप में देखने के बजाय कानून के तहत ग्राम सभाओं की भागीदारी के रूप में देखना चाहिए।"

🛡️ जिन 4 गांवों को अधिकार मिले, वहां भी विभाग का हस्तक्षेप: झाबुआ में श्रमदान व पौधरोपण रोकने के आरोप

टास्क फोर्स सदस्यों के अनुसार जिन चार गांवों को सीएफआर अधिकार दिए गए हैं, वहां भी स्थिति बहुत सुचारू नहीं है।

दावा है कि चार में से केवल दो गांवों को सही अधिकार पत्र मिले हैं, जबकि दो गांवों के टाइटल दस्तावेजों में तकनीकी खामियां हैं, जिन्हें सुधारने के लिए ग्राम सभाएं आवेदन कर चुकी हैं। सदस्यों ने यह भी उजागर किया कि झाबुआ के दो गांवों ने अधिकार मिलने के बाद जब जंगल संरक्षण का कार्य शुरू किया—जिसमें एक गांव में जल संरक्षण हेतु श्रमदान से बांध बनाना और दूसरे में पौधरोपण शामिल था—तो वन विभाग के अधिकारियों ने दोनों ही गतिविधियों में बेवजह हस्तक्षेप किया।

🗄️ दावे मंजूर होने के बाद भी अलमारी में बंद हैं अधिकार पत्र: अधिकारियों के हस्ताक्षर न होने से अटका मामला

टास्क फोर्स के सदस्यों का कहना है कि प्रदेश के कई जिलों में जिला स्तरीय समितियों (DLC) द्वारा दावों को अंतिम मंजूरी दी जा चुकी है, लेकिन वन विभाग के अधिकारियों के हस्ताक्षर न होने के कारण आधिकारिक अधिकार पत्र जारी नहीं किए जा रहे हैं।

सदस्यों ने सवाल उठाया कि जब कानून सीधे ग्राम सभा को शक्ति प्रदान करता है और प्रक्रिया किसी एक विभागीय अधिकारी के स्तर पर अटक जाए, तो आदिवासी और वनाश्रित समुदायों को अधिकार देने का मुख्य उद्देश्य कैसे पूरा होगा।

🏛️ एक साल से नहीं हुई टास्क फोर्स की बैठक: मांगें पूरी न होने पर जनता के बीच जाने की तैयारी

टास्क फोर्स के सदस्यों के अनुसार, पिछली बैठक में जिन महत्वपूर्ण मुद्दों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया गया था, उन पर अमल नहीं हुआ है।

इसके अलावा, पिछले करीब एक साल से टास्क फोर्स की कोई समीक्षा बैठक आयोजित नहीं की गई है। टास्क फोर्स का कार्यकाल दो वर्ष का होता है और नवंबर में यह मौजूदा कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। सदस्यों की अपेक्षा थी कि हर छह महीने में कम से कम एक बैठक अनिवार्य रूप से हो, परंतु पूरे कार्यकाल में केवल दो बैठकें ही बुलाई गईं। बैठकों के अभाव को लेकर सदस्यों ने मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) और प्रशासनिक सचिव स्तर पर वार्ता की है। उनका कहना है कि यदि शासन स्तर पर जल्द बैठक नहीं बुलाई जाती, तो वे इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से जनता के बीच ले जाएंगे।

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