Muharram 2026: मुहर्रम का महत्व, कर्बला की शहादत और इंसानियत का संदेश; जानिए क्यों मनाया जाता है यह पर्व
मुहर्रम का महीना गम, सब्र और कुर्बानी का प्रतीक है। कर्बला के शहीदों की याद में दुनिया भर में मातम और मजलिसों का आयोजन। जानिए इस पर्व का गहरा संदेश।
भोपाल। मुहर्रम का महीना न केवल गम का पर्व है, बल्कि यह पूरी दुनिया को इंसानियत, सत्य, इंसाफ, सब्र और त्याग का संदेश देता है। दुनिया भर में शिया समुदाय के लोग मुहर्रम की पहली तारीख से 10वीं तारीख तक काले कपड़े पहनकर और नंगे पैर मातम करते हुए हजरत इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की कुर्बानियों को याद करते हैं। इन दस दिनों तक मजलिसों का आयोजन किया जाता है, जिनमें इमाम हुसैन के संघर्ष और उनके आदर्शों पर चर्चा की जाती है।
⚔️ न्याय की रक्षा के लिए शहादत
करीब 1400 साल पहले कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन ने अपने परिवार और साथियों के साथ तीन दिन तक भूखे-प्यासे रहने के बावजूद अन्याय और अत्याचार के आगे घुटने नहीं टेके थे। उन्होंने न्याय और मानवता की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। आज भी इमाम हुसैन की यह कुर्बानी जुल्म के खिलाफ डटकर खड़े होने और सब्र रखने की प्रेरणा देती है।
🕯️ 7वीं मुहर्रम: मासूम अली असगर की याद
मुहर्रम की 10वीं तारीख के अलावा 7वीं मुहर्रम का भी विशेष महत्व है। यह दिन हजरत इमाम हुसैन के छह माह के बेटे हजरत अली असगर की शहादत की याद में मनाया जाता है। कर्बला की जंग के दौरान जब प्यास से व्याकुल मासूम के लिए पानी मांगा गया, तो यजीदी सेना ने उन्हें तीर मारकर शहीद कर दिया था। शिया समुदाय इस घटना को कर्बला की सबसे मार्मिक घटनाओं में से एक मानता है। इसी दिन झूले (पालने), ताबूत और मातमी जुलूस निकालकर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।
🤝 मातम का उद्देश्य और संदेश
शिया समुदाय के स्कॉलर एजाज रिजवी और अनूश रिजवी का कहना है कि मातम का उद्देश्य किसी को तकलीफ पहुँचाना नहीं, बल्कि कर्बला के संदेश को जीवित रखना है। यह संदेश देता है कि इंसान स्वयं मुश्किलें सह ले, लेकिन कभी किसी निर्दोष को कष्ट न पहुँचाए। आज के दौर में यह पर्व हमें अन्याय के खिलाफ खड़े होने और संघर्ष करने का साहस भी प्रदान करता है। मुहर्रम का महीना हमें सिखाता है कि सत्य की राह पर चलना कठिन हो सकता है, लेकिन अंततः विजय मानवता की ही होती है।
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