MP Promotion Rules 2025: पदोन्नति नियमों को लेकर कर्मचारियों में आक्रोश; हाई कोर्ट में मामला लंबित होने के बावजूद बैठक पर उठे सवाल
मध्य प्रदेश में 2025 पदोन्नति नियमों को लेकर बढ़ता विवाद। हाई कोर्ट में मामला लंबित होने के बाद भी बैठक पर कर्मचारी संघ ने जताई आपत्ति।
भोपाल। मध्य प्रदेश में पदोन्नति नियमों (Promotion Rules 2025) को लेकर एक बार फिर स्थिति तनावपूर्ण हो गई है। कर्मचारियों और अधिकारियों का कहना है कि जिस नियम को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है, उसके आधार पर पदोन्नति प्रक्रिया आगे बढ़ाना दुर्भाग्यपूर्ण है। मंत्रालय सेवा अधिकारी-कर्मचारी संघ का तर्क है कि शासन ने हाई कोर्ट में अंडरटेकिंग दी थी कि अंतिम निर्णय आने तक पदोन्नतियां नहीं की जाएंगी, ऐसे में 29 जून को पदों के निर्धारण हेतु बैठक बुलाना नियमों के विरुद्ध है।
📉 पदोन्नति में आरक्षण का गणित और सामान्य वर्ग का तर्क
मंत्रालय सेवा अधिकारी-कर्मचारी संघ के अध्यक्ष सुधीर नायक ने नियमों की जटिलता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि 'एक्स' और 'वाय' के मूल्य को शून्य से एक के बीच रखने का अर्थ यह है कि पदोन्नति में आरक्षण तो लागू रहेगा, लेकिन यह एससी (SC) और एसटी (ST) वर्ग के लिए निर्धारित 36 प्रतिशत से कम रहेगा। सामान्य वर्ग का आरोप है कि इन नियमों के कारण अनारक्षित वर्ग को आने वाले 15-20 वर्षों तक नुकसान उठाना पड़ेगा, जिसकी भरपाई करना असंभव होगा।
📊 आरक्षित वर्ग का बढ़ता प्रतिनिधित्व और पदोन्नति के समीकरण
कर्मचारी संघ ने मंत्रालय का उदाहरण देते हुए कहा कि वर्तमान में लगभग हर चैनल के उच्च संवर्गों में आरक्षित वर्ग के अधिकारी-कर्मचारी बहुतायत में हैं। यदि मौजूदा नियमों के अनुसार पदोन्नति होती है, तो उप सचिव से लेकर अवर सचिव स्तर तक सभी पदों पर आरक्षित वर्ग का ही कब्जा हो जाएगा। स्थिति यह है कि आरक्षित वर्ग न केवल अपने कोटे के पदों पर, बल्कि अनारक्षित (सामान्य) पदों पर भी पदोन्नत होगा।
💡 समाधान के सुझाव और भविष्य की राह
संघ ने अपनी मांगें रखते हुए कहा है कि:
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जिन संवर्गों में एससी-एसटी वर्ग का प्रतिनिधित्व 36 प्रतिशत से अधिक है, वहां तब तक पदोन्नति नहीं की जाए जब तक वह प्रतिनिधित्व निर्धारित सीमा तक न आ जाए।
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आरक्षित वर्ग का कर्मचारी अनारक्षित पद पर पदोन्नत न हो।
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वर्ष 2016 से पदोन्नतियां काल्पनिक रूप से (Notional Basis) लागू की जाएं, भले ही उस अवधि का बकाया (Arrear) न दिया जाए, जैसा कि विधि विभाग में पहले किया जा चुका है।
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