Symbol of Unity: विदिशा में गंगा-जमुनी तहजीब की अद्भुत कहानी; मजार के सामने हनुमान मंदिर और हिंदू परिवार निभा रहा मुहर्रम की परंपरा
विदिशा में मुहर्रम पर साझा संस्कृति की मिसाल। बावड़ी वाले बाबा की सवारी का संचालन 5 पीढ़ियों से एक हिंदू कुशवाहा परिवार कर रहा है। जानें इस अनूठी परंपरा को।
विदिशा। मुहर्रम के पवित्र अवसर पर विदिशा से एक ऐसा संदेश सामने आया है जो देश की साझा संस्कृति और भाईचारे की एक बेमिसाल तस्वीर पेश करता है। यहाँ 'बावड़ी वाले बाबा' की सवारी वर्षों से लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई है, जिसे एक हिंदू कुशवाहा परिवार पिछले पांच दशकों से भी अधिक समय से पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहा है। यह आयोजन न केवल धार्मिक परंपरा है, बल्कि यह सांप्रदायिक सौहार्द की एक जीता-जागता उदाहरण भी है।
🕌 मजार के सामने मंदिर: आस्था की अनोखी तस्वीर
खाई मोहल्ला स्थित 'बावड़ी वाले बाबा' की मजार के ठीक सामने बजरंगबली का मंदिर स्थित है। यह दृश्य ही विदिशा की उस साझी विरासत को दर्शाता है, जहाँ धर्म की सीमाएं इंसानियत और विश्वास के सामने गौण हो जाती हैं। यहाँ वर्षों से हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय बिना किसी भेदभाव के श्रद्धा प्रकट करते हैं, जो इसे विदिशा की पहचान बनाता है।
👨👩👧👦 पाँच पीढ़ियों से अटूट समर्पण
कुशवाहा परिवार का इस परंपरा से जुड़ाव पाँच पीढ़ियों पुराना है। परिवार के वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि आर्थिक तंगी के कठिन दौर में भी उन्होंने बाबा की सेवा में कोई कमी नहीं आने दी। परिवार के बुजुर्गों द्वारा शुरू की गई यह सेवा अब उनके नाती-पोतों द्वारा भी उसी निष्ठा के साथ निभाई जा रही है। आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके लिए किसी से चंदा नहीं मांगा जाता; कुशवाहा परिवार स्वयं पूरा खर्च उठाता है।
🥁 भव्यता और जनभागीदारी
'बावड़ी वाले बाबा' की सवारी की भव्यता बढ़ाने के लिए परिवार विशेष तैयारी करता है। इस वर्ष मुंबई से पारंपरिक ढोल और दिल्ली से सेहरा मंगवाए गए हैं। ढोल की गूंज और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ इस सवारी को एक उत्सव का रूप दे देती है। आयोजन में हिंदू और मुस्लिम समाज के लोग कंधे से कंधा मिलाकर व्यवस्था संभालते हैं।
🌟 सामाजिक एकता का प्रतीक
स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह आयोजन धर्म से ऊपर उठकर सामाजिक एकता का प्रतीक बन चुका है। विदिशा की यह परंपरा संदेश देती है कि आस्था का रास्ता हमेशा इंसानियत और भाईचारे से होकर ही गुजरता है। जिस तरह से एक हिंदू परिवार पीढ़ियों से एक मुस्लिम संत की मजार की सेवा कर रहा है, वह भारतीय संस्कृति की 'विविधता में एकता' को जीवंत करता है।
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