Satpura Tiger Reserve News: सतपुड़ा के जंगल में दिखा दुर्लभ सफेद बायसन और सांभर; पर्यटकों में उत्साह, वैज्ञानिकों ने बताई ये वजह
सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में सफेद बायसन और सांभर देखे गए। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार यह ल्यूसिज्म नामक दुर्लभ आनुवंशिक स्थिति है।
नर्मदापुरम। मध्य प्रदेश स्थित सतपुड़ा टाइगर रिजर्व (STR) अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है। हाल ही में यहाँ सफारी पर गए पर्यटकों के लिए एक रोमांचक दृश्य तब सामने आया, जब उन्हें सामान्य काले बायसन और भूरे सांभर के बजाय सफेद रंग के बायसन और सांभर देखने को मिले। इस दुर्लभ नजारे ने न केवल पर्यटकों को रोमांचित किया है, बल्कि वन्यजीव विशेषज्ञों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है।
🧬 क्या है इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण?
वन्यजीव विशेषज्ञ और नेचुरलिस्ट हरेन्द्र साहू के अनुसार, इन जानवरों का रंग सफेद या हल्का दिखने का मुख्य कारण 'ल्यूसिज्म (Leucism)' नामक एक दुर्लभ आनुवंशिक स्थिति है। इस स्थिति में जानवर की त्वचा या बालों में मेलेनिन नामक पिगमेंट का निर्माण सामान्य से कम होता है। फील्ड डायरेक्टर राखी नंदन ने इसे एल्बिनिज्म (Albinism) से जोड़ते हुए बताया कि मेलेनिन की कमी के कारण इनका रंग सफेद हो जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये कोई अलग प्रजाति नहीं हैं, बल्कि आनुवंशिक प्रभाव के कारण इनका रंग सामान्य से अलग दिखता है।
🔍 ल्यूसिज्म और एल्बिनिज्म में अंतर
विशेषज्ञों ने बताया कि ल्यूसिज्म और एल्बिनिज्म में एक बड़ा अंतर होता है। ल्यूसिज्म में जानवर की आँखों का रंग सामान्य रहता है, जबकि एल्बिनिज्म में मेलेनिन की पूर्ण अनुपस्थिति के कारण आँखें अक्सर लाल या गुलाबी दिखाई देती हैं। सतपुड़ा में नजर आए ये जानवर ल्यूसिज्म का एक अनूठा उदाहरण हैं, जो रिजर्व की प्राकृतिक आनुवंशिक विविधता को दर्शाते हैं।
🌲 जैव विविधता का गढ़ है सतपुड़ा
सतपुड़ा के जंगल भारत के सबसे पुराने और समृद्ध वनों में से हैं। नर्मदा और ताप्ती नदियों के बीच स्थित यह क्षेत्र जैव विविधता से भरा है। यहाँ 90 से अधिक बाघ, लगभग 8,000 सांभर और 5,600 से अधिक इंडियन गौर (बायसन) मौजूद हैं। संस्कृत के 'सतपुड़ा' (सात पहाड़ियों की श्रृंखला) से उपजा यह बायोस्फीयर रिजर्व न केवल वन्यजीवों का घर है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है।
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