NHAI ने इसे बताया रूटीन मेंटेनेंस; सिंहस्थ 2028 से पहले उज्जैन-बदनावर हाईवे पर डामरीकरण का काम शुरू

907 करोड़ रुपये की लागत से बने उज्जैन-बदनावर फोरलेन हाईवे की डेढ़ साल में ही मरम्मत करनी पड़ रही है। NHAI इसे रूटीन मेंटेनेंस बता रहा है, जबकि गुणवत्ता पर सवाल उठे हैं।

Oct 31, 2026 - 12:45
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NHAI ने इसे बताया रूटीन मेंटेनेंस; सिंहस्थ 2028 से पहले उज्जैन-बदनावर हाईवे पर डामरीकरण का काम शुरू

उज्जैन । करीब 907 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार किया गया उज्जैन-बदनावर फोरलेन हाईवे महज डेढ़ साल के भीतर ही मरम्मत की स्थिति में पहुंच गया है। वर्तमान में शहर के तपोभूमि से चिंतामन क्षेत्र के बीच सड़क की ऊपरी सतह को खुरचकर (मिलिंग) दोबारा डामरीकरण करने का काम किया जा रहा है।

सड़क के इस महत्वपूर्ण हिस्से को दोबारा बनाने की नौबत आने से निर्माण कार्य की गुणवत्ता और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हालांकि, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) इसे किसी तरह की सड़क की खराबी मानने से इनकार कर रहा है, बल्कि इसे मानसून के बाद होने वाला सामान्य और नियमित रखरखाव बता रहा है। प्राधिकरण का तर्क है कि कुछ सीमित हिस्सों में किए जा रहे सुधार कार्यों के आधार पर पूरे प्रोजेक्ट की गुणवत्ता को खराब करार देना उचित नहीं है।

📋 15 साल तक निर्माण एजेंसी की जिम्मेदारी; सिंहस्थ 2028 को लेकर हो रही है निगरानी

उज्जैन-बदनावर फोरलेन परियोजना से जुड़े मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • कुल लंबाई व लागत: यह फोरलेन लगभग 69.1 किलोमीटर लंबा है, जिसका निर्माण हाइब्रिड एन्युटी मॉडल (HAM) के तहत लगभग 907 करोड़ रुपये की लागत से किया गया है।

  • रखरखाव का अनुबंध: समझौते के नियमों के अनुसार, संबंधित निर्माण एजेंसी को अगले 15 वर्षों तक इस सड़क के रखरखाव, देखरेख और मरम्मत की पूरी जिम्मेदारी निभानी है। मौजूदा मरम्मत पर आने वाला सारा खर्च भी एजेंसी द्वारा ही वहन किया जाएगा।

  • सिंहस्थ की तैयारी: एनएचएआई अधिकारियों का कहना है कि आगामी सिंहस्थ 2028 के दौरान श्रद्धालुओं व पर्यटकों के लिए पूरी तरह सुगम यातायात सुनिश्चित करने के लिए सड़क के विभिन्न हिस्सों की पैनी निगरानी की जा रही है और जरूरी सुधार समय पर किए जा रहे हैं।

❓ जवाबदेही तय होना क्यों है जरूरी? क्या कहती है तकनीकी जांच?

भले ही एनएचएआई ने खराबी को सीमित हिस्सों तक सीमित बताया हो, लेकिन जानकारों और आम नागरिकों के मन में कई बड़े सवाल उठ रहे हैं:

  • महज डेढ़ साल में जरूरत क्यों? सवाल यह है कि जिस सड़क के निर्माण पर 907 करोड़ खर्च हुए हों और जिसे बने अभी बमुश्किल डेढ़ साल ही बीते हों, उसकी सतह को मिलिंग कर दोबारा डामरीकरण करने की आवश्यकता क्यों आन पड़ी?

  • मुख्य कारण क्या हैं? क्या इसकी वजह उपयोग की गई निर्माण सामग्री, डामर की गुणवत्ता, सड़क बिछाने की तकनीकी प्रक्रिया में कोई चूक है, या फिर मानसून का असामान्य असर?

  • पारदर्शिता की मांग: कितने हिस्सों में सतह उखड़ी और मरम्मत की वास्तविक लंबाई कितनी है, यह स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होनी चाहिए। मरम्मत केवल सतही पैचवर्क तक सीमित न रहे, बल्कि यह सड़क सिंहस्थ के दौरान और उसके बाद भी लंबे समय तक टिकाऊ बनी रहे, इसके लिए संबंधित एजेंसी की जवाबदेही तय होना अत्यंत आवश्यक है।

⚠️ उज्जैन-गरोठ फोरलेन परियोजना में भी सामने आ चुकी है गंभीर लापरवाही

यह पहला मौका नहीं है जब एनएचएआई के किसी प्रोजेक्ट पर सवाल उठे हों। इससे पहले उज्जैन-गरोठ फोरलेन परियोजना में भी निर्माण गुणवत्ता को लेकर बड़ी लापरवाही सामने आ चुकी है:

  • प्रेमनगर आरओबी विवाद: प्रेमनगर में फरवरी 2026 के दौरान आरओबी की रिटेनिंग वॉल धंस गई थी। जून में दोबारा निर्माण कार्य पूरा होने के बाद अगस्त माह में आरई (RE) वॉल के पैनल फिर से खिसक गए।

  • आईआईटी दिल्ली की जांच: स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आईआईटी (IIT) दिल्ली के विशेषज्ञों से निरीक्षण कराया गया, जिसके बाद लगभग 500 मीटर हिस्से को पूरी तरह तोड़कर नए सिरे से बनाने का बड़ा निर्णय लिया गया।

  • कालियादेह मामला: इसके बाद सितंबर माह में कालियादेह क्षेत्र में भी रिटेनिंग वॉल के ब्लॉक खिसकने की घटना सामने आई थी। इन तमाम घटनाओं ने निर्माण एजेंसी की कार्यशैली और विभागीय निगरानी व्यवस्था पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए थे। अब उज्जैन-बदनावर परियोजना में भी कम समय के भीतर सड़क सुधार की जरूरत पड़ने से जनता में चिंता का माहौल है।

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