दूसरों की जान बचाने वाले 'गुमनाम नायक' खुद आर्थिक संकट में; जानें भोपाल के नगर निगम गोताखोरों का दर्द

भोपाल में सैकड़ों जिंदगियां बचाने वाले नगर निगम के गोताखोर खुद बदहाली के शिकार। 10 हजार रुपये वेतन और ओवरटाइम न मिलने से परेशान गोताखोरों की पूरी कहानी।

Jun 30, 2026 - 14:17
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दूसरों की जान बचाने वाले 'गुमनाम नायक' खुद आर्थिक संकट में; जानें भोपाल के नगर निगम गोताखोरों का दर्द

भोपाल। राजधानी भोपाल की झीलों और जलाशयों में जब भी कोई संकट आता है, तो नगर निगम के गोताखोर ही वे 'गुमनाम नायक' होते हैं जो अपनी जान की बाजी लगाकर दूसरों को जीवनदान देते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि दूसरों को मौत के मुंह से बाहर निकालने वाले ये जांबाज खुद आज गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। उनकी बदहाली न केवल उनके साहस का अपमान है, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता को भी दर्शाती है।

💸 10 हजार रुपये में घर चलाना मुश्किल

गोताखोर फैज उल्ला, आसिफ खान और मजहर का कहना है कि नगर निगम द्वारा दिया जाने वाला 10 हजार रुपये का वेतन बढ़ती महंगाई के दौर में नाकाफी है। बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा और घर के खर्चों का बोझ उठाना उनके लिए एक कठिन चुनौती बन गया है। जिन हाथों ने शहर के सैकड़ों परिवारों को उनके प्रियजन लौटाए हैं, आज वे हाथ अपनी आर्थिक मांगों के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं।

👮 पुलिस के रवैये और नियमितीकरण पर सवाल

गोताखोरों ने केवल वेतन की समस्या ही नहीं, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। गोताखोर दुर्गा का कहना है कि जब वे किसी की जान बचाकर थाने पहुंचते हैं, तो पुलिस का व्यवहार उचित नहीं होता। वहीं, 12 वर्षों से कार्यरत आसिफ खान और मजहर खान ने शिकायत की है कि उन्हें न तो नियमित किया गया है और न ही त्योहारों (जैसे विसर्जन) के दौरान किए गए 24-24 घंटे के ओवरटाइम का मेहनताना दिया जाता है।

🏛️ प्रशासन का रुख

इस मामले पर भोपाल नगर निगम की महापौर मालती राय ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि निगम अपने सभी कर्मचारियों—चाहे वे गोताखोर हों, सफाई मित्र हों या फायर ब्रिगेड कर्मी—के हितों के प्रति गंभीर है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि नियमों और प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत जो भी संभव होगा, कर्मचारियों के कल्याण के लिए किया जाएगा।

❓ क्या व्यवस्था करेगी इन नायकों की सुध?

यह समस्या केवल वेतन की नहीं है, बल्कि उस साहस और समर्पण की है जिसे समाज को सम्मान देना चाहिए। ये वे कर्मचारी हैं जो हर संकट की घड़ी में सबसे पहले घटनास्थल पर पहुंचते हैं। क्या व्यवस्था इन गुमनाम नायकों की मांगों को पूरा कर उन्हें उनका वाजिब हक देगी? यह सवाल आज भोपाल के हर जागरूक नागरिक के मन में है।

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