क्या बीमा कंपनी ने आपका क्लेम किया रिजेक्ट? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उपभोक्ताओं को मिली बड़ी राहत
बीमा दावों में तकनीकी देरी अब नहीं बनेगी रिजेक्शन का कारण। जबलपुर उपभोक्ता आयोग ने सुप्रीम कोर्ट की नजीर का हवाला देते हुए उपभोक्ता के पक्ष में सुनाया फैसला।
जबलपुर। बीमा कंपनियां अक्सर दुर्घटना की सूचना देने में हुई देरी को आधार बनाकर दावों को अस्वीकार कर देती हैं, लेकिन जबलपुर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में इसे अनुचित ठहराया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यदि दुर्घटना वास्तविक है, तो मात्र प्रक्रिया संबंधी कमियों या देरी के आधार पर बीमाधारक को उसके वैध अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
📊 मामला: चार साल की देरी के बाद भी मिला न्याय
बैतूल निवासी मोहन चक्र अग्रवाल की बोलेरो वर्ष 2020 में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने दुर्घटना की सूचना चार वर्ष चार माह बाद मिलने, वाहन के कथित व्यावसायिक उपयोग और क्षमता से अधिक सवारियां होने का तर्क देकर दावा निरस्त कर दिया था। आयोग के अध्यक्ष पंकज यादव एवं सदस्य सोनल पंडित की पीठ ने इस तर्क को खारिज करते हुए कंपनी को सेवा में कमी का दोषी माना। आयोग ने कहा कि जब कंपनी के सर्वेयर ने स्वयं दुर्घटना को वास्तविक माना है, तो दावा निरस्त करना न्यायसंगत नहीं है।
📜 सुप्रीम कोर्ट की नजीर बनी आधार
परिवादी के अधिवक्ता अरुण जैन ने सर्वोच्च न्यायालय के 'ओम प्रकाश बनाम रिलायंस जनरल इंश्योरेंस' मामले का हवाला दिया। आयोग ने इस दलील को स्वीकार किया कि दुर्घटना वास्तविक होने पर सूचना देने में हुई देरी को दावा अस्वीकार करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। उपभोक्ता संरक्षण कानून का मूल उद्देश्य संकट की घड़ी में पीड़ित को सुरक्षा प्रदान करना है।
💡 बीमाधारकों के लिए संदेश
यह फैसला उन हजारों उपभोक्ताओं के लिए एक उम्मीद की किरण है, जिनके बीमा क्लेम तकनीकी आधार पर ठुकरा दिए जाते हैं। आयोग ने स्पष्ट संकेत दिया है कि बीमा अनुबंध का उद्देश्य उपभोक्ता को सुरक्षा देना है, न कि उन्हें कानूनी उलझनों में फंसाना। यदि धोखाधड़ी सिद्ध नहीं होती, तो प्रक्रियात्मक कमियों पर कंपनी को उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। यह निर्णय भविष्य में उपभोक्ता अधिकारों को और अधिक मजबूत करेगा।
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