जीते जी संघर्ष, मरने के बाद भी ठिकाना नहीं; रतलाम में किन्नर समुदाय को अंतिम संस्कार के लिए नहीं मिली जमीन
रतलाम में किन्नर जोया की मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार के लिए जगह नहीं मिलने से समुदाय आक्रोशित। प्रशासन से जमीन उपलब्ध कराने की मांग।
रतलाम। हमारे देश में किन्नर (Third Gender) समुदाय को कानूनी पहचान तो मिल गई है, लेकिन समाज में उन्हें सम्मानजनक स्थान और बुनियादी सुविधाएं आज भी नसीब नहीं हैं। इसका ताजा उदाहरण रतलाम में सामने आया, जहां जोया नामक किन्नर की लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हुई, तो उनके अंतिम संस्कार के लिए पूरे शहर में कहीं जगह नहीं मिली। अंततः समुदाय के लोगों को उन्हें दूसरी जगह लेकर जाना पड़ा।
⚖️ मौत के बाद भी सुकून की तलाश
किन्नर समाज की जागीरदार घराने की काजल जागीरदार ने बताया कि यह कोई पहली बार नहीं है। पिछले वर्ष जब उनके गुरु का निधन हुआ था, तब भी समाधि के लिए जमीन न मिलने पर उन्हें गांव के नाले के किनारे अंतिम संस्कार करना पड़ा था। समुदाय का कहना है कि सरकार और प्रशासन से कई बार गुहार लगाने के बावजूद उन्हें आज तक अंतिम संस्कार के लिए कोई सुरक्षित भूमि आवंटित नहीं की गई है।
🗣️ क्या है प्रशासन का पक्ष?
इस मामले पर रतलाम के एसडीएम तरुण जैन ने कहा कि सिमलावदा गांव में स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से अंतिम संस्कार की व्यवस्था तत्काल करवाई गई थी। वहीं, जिला पंचायत सीईओ वैशाली जैन ने स्वीकार किया कि प्रशासन के संज्ञान में यह मुद्दा आया है कि किन्नर समुदाय के लिए अंतिम संस्कार की भूमि का अभाव है। उन्होंने आश्वासन दिया कि इस मामले में जल्दी ही आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
❓ बड़ा सवाल: कब मिलेगी समानता?
थर्ड जेंडर के रूप में समानता का अधिकार पा चुके किन्नर समाज के लिए यह एक कड़वी सच्चाई है कि वे जीते जी तो समाज की उपेक्षा झेलते ही हैं, मौत के बाद भी उन्हें सम्मानजनक विदाई तक के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। समाज और सरकार के सामने यह एक बड़ा प्रश्न है कि आखिर कब इस समुदाय को मुख्यधारा की तरह मूलभूत सुविधाएं और सम्मान प्राप्त हो सकेगा?
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