इंदौर में बड़ी कॉलोनियों और टाउनशिप के लिए कड़े नियम, खुद करना होगा कचरे का निपटान
इंदौर नगर निगम ने नए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 को लागू कर दिया है। इसके तहत नियमों के उल्लंघन पर 150% तक पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूली जाएगी और पूरी व्यवस्था की डिजिटल ट्रैकिंग होगी।
इंदौर। देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में स्वच्छता व्यवस्था को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में नगर निगम ने एक और बड़ा ऐतिहासिक कदम उठाया है. केंद्र सरकार के नए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 को पूरे जिले में आधिकारिक रूप से लागू कर दिया गया है.
अगले 15 महीनों में चरणबद्ध (Phase-wise) तरीके से धरातल पर उतरने वाली इस नई व्यवस्था के तहत अब केवल व्यावसायिक संस्थानों को ही नहीं, बल्कि शहर की बड़ी आवासीय कॉलोनियों, सोसायटियों और टाउनशिप को भी इन कड़े नियमों का अनिवार्य रूप से पालन करना होगा. कचरा प्रबंधन में किसी भी प्रकार की लापरवाही या नियमों के उल्लंघन पर दोषी पाए जाने वाले संस्थानों से 150 प्रतिशत तक पर्यावरण क्षतिपूर्ति (Penalty) वसूली जाएगी. इस पूरी व्यवस्था की डिजिटल ट्रैकिंग की जाएगी और इसकी सीधी निगरानी जिला कलेक्टर तथा नगर निगम आयुक्त के स्तर पर होगी.
नगर निगम ने दैनिक कचरा उत्पादन और परिसर की क्षमता के आधार पर तीन प्रमुख कड़े मानक तय किए हैं, जिनके दायरे में आने वाले संस्थानों को 'बल्क वेस्ट जेनरेटर' (Bulk Waste Generator) की श्रेणी में रखा जाएगा:
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क्षेत्रफल का मानक: जिन व्यावसायिक या आवासीय संस्थानों का कुल निर्मित क्षेत्र (Built-up Area) 20 हजार वर्ग मीटर से अधिक होगा.
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जल उपयोग का मानक: जो संस्थान प्रतिदिन 40 किलोलीटर या उससे अधिक पानी का उपयोग (Water Consumption) करते हैं.
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कचरा उत्पादन का मानक: जहां से प्रतिदिन 100 किलोग्राम या उससे अधिक कचरा उत्पन्न होता है.
मुख्य रूप से शामिल संस्थान: इन मानकों के तहत शहर के सभी बड़े होटल, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, शॉपिंग मॉल, रेस्टोरेंट, बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान और बहुमंजिला आवासीय टाउनशिप को इस श्रेणी में शामिल किया गया है.
नए नियमों के लागू होने के बाद अब बड़े अपार्टमेंट और नई आवासीय परियोजनाओं को अपने स्वीकृत मास्टर प्लान में ही 200 से 300 वर्ग मीटर का एक समर्पित कचरा प्रबंधन केंद्र (Waste Management Center) विकसित करना अनिवार्य होगा.
इसके अलावा, नगर निगम के स्वास्थ्य और पर्यावरण अधिकारी समय-समय पर इन परिसरों का नियमित निरीक्षण और सैंपलिंग करेंगे. सभी बल्क वेस्ट जेनरेटर संस्थानों को अपने परिसर के भीतर ही गीले कचरे और खाद्य अपशिष्ट (Food Waste) के वैज्ञानिक निपटान के लिए बायो-कंपोस्टिंग और बायोगैस तकनीक को बढ़ावा देना होगा. इसका मुख्य उद्देश्य लैंडफिल साइट्स (कचरा ट्रेंचिंग ग्राउंड) पर कचरे के बढ़ते दबाव और निर्भरता को कम करना है.
इंदौर नगर निगम की इस नई व्यवस्था के तहत अब पारंपरिक सूखा-गीला कचरा अलग करने के ढर्रे को और अधिक विस्तृत किया गया है. अब घरों और व्यावसायिक संस्थानों को अपने कचरे को अनिवार्य रूप से निम्नलिखित चार श्रेणियों में विभाजित करना होगा:
| कचरे की श्रेणी | शामिल होने वाली सामग्री | निपटान की निर्धारित व्यवस्था |
| 1. गीला कचरा (Wet Waste) | रसोई का अपशिष्ट, बचा हुआ भोजन, फल-सब्जियों के छिलके | परिसर के बायो-कंपोस्टिंग या बायोगैस प्लांट में उपयोग. |
| 2. सूखा कचरा (Dry Waste) | कागज, प्लास्टिक, गत्ता, कांच, धातु के टुकड़े | नगर निगम के कलेक्शन वाहनों के माध्यम से रीसाइक्लिंग केंद्र. |
| 3. सैनिटरी कचरा (Sanitary Waste) | डायपर, सेनेटरी नैपकिन, पट्टियां आदि | सुरक्षित पैकेजिंग के साथ निगम की विशेष गाड़ियों को सौंपना. |
| 4. खतरनाक अपशिष्ट (Hazardous Waste) | बैटरी, ई-वेस्ट, पुराने थर्मामीटर, एक्सपायरी दवाएं | इन्हें केवल सरकार द्वारा अधिकृत संग्रह केंद्रों पर ही जमा किया जा सकेगा. |
इंदौर नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि इस डिजिटल मॉनिटरिंग, नियमित औचक निरीक्षण और कड़े दंडात्मक प्रावधानों से शहर में कचरा प्रबंधन की व्यवस्था अधिक प्रभावी और सुदृढ़ होगी. स्रोत स्तर (Source Level) पर ही कचरे का यह चार-स्तरीय पृथक्करण (Segregation) बढ़ने से न केवल शहरी प्रदूषण में भारी कमी आएगी, बल्कि स्वच्छ, हरित और टिकाऊ शहरी विकास को एक नई गति मिलेगी. नगर निगम ने सभी बड़े संस्थानों से अपील की है कि वे समय सीमा के भीतर अपने परिसरों में आवश्यक बुनियादी ढांचा तैयार कर लें, ताकि दंडात्मक कार्रवाई से बचा जा सके.
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