हाईकोर्ट ने महिला की उम्रकैद रद्द की; कैदियों के भोजन पर DGP जेल के हलफनामे को बताया गुमराह करने वाला
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पति की हत्या के आरोप में महिला की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। इसके साथ ही डीजीपी जेल के हलफनामे को गुमराह करने वाला बताया।
भोपाल। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के उस फैसले को पूरी तरह पलट दिया है, जिसमें एक महिला को अपने ही पति की हत्या के आरोप में उम्रकैद (आजीवन कारावास) की सजा सुनाई गई थी. हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने अपने ऐतिहासिक आदेश में कानून का अहम सिद्धांत दोहराते हुए कहा कि, शक चाहे जितना भी मजबूत क्यों न हो, परंतु वह कभी भी कानूनी साक्ष्य (Evidence) का स्थान नहीं ले सकता. युगलपीठ ने महिला को तुरंत दोषमुक्त करने का आदेश दिया.
⚖️ 1. सिर्फ शक के आधार पर किसी को सजा से दंडित नहीं किया जा सकता: हाईकोर्ट
भोपाल के चक्की चौराहा, तुलसी नगर निवासी सुशील उर्फ सुधा गवाहड़े की तरफ से हाईकोर्ट में एक क्रिमिनल अपील दायर की गई थी. याचिका में कहा गया था कि ट्रायल कोर्ट ने उसे पति की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जबकि प्रकरण की सुनवाई के दौरान अभियोजन (Prosecution) के मुख्य गवाह अपनी बात से पलट (Hostile) गए थे. इसके बावजूद भी निचली अदालत ने महज संदेह के आधार पर उसे इतनी बड़ी सजा दे दी, जो न्यायसंगत नहीं है.
🩸 2. क्या था पूरा मामला? मृतक के शरीर पर मिले थे 33 चोटों के निशान
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी महिला ने अपने पति दिनेश पर घरेलू गैस सिलेंडर और हथौड़े से जानलेवा हमला किया, जिसके बाद उसका गला दबाकर उसकी हत्या कर दी. महिला ने अपने पति दिनेश को 20 दिसंबर 2018 को उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया था, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई थी.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, मृतक के शरीर पर 33 चोटों के निशान पाए गए थे और मौत का मुख्य कारण गला घोंटना (Strangulation) बताया गया था. पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच के बाद महिला के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया था.
🧑👦 3. घटना के समय घर में मौजूद 14 वर्षीय बेटे से क्यों नहीं की गई पूछताछ?
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आया कि मृतक दिनेश अत्यधिक शराब पीने का आदी था और अक्सर मोहल्ले में लोगों से झगड़ा व मारपीट करता था. घटना के दिन भी वह शराब पीकर घर आया था और पहले से ही चोटिल था.
अदालत ने इस बात पर गंभीर आपत्ति जताई कि ट्रायल के दौरान दिनेश को चोट आने के संबंध में मुख्य चश्मदीद यानी उनके 14 वर्षीय बेटे से कोई जरूरी पूछताछ नहीं की गई, जबकि वह घटना के समय घर में ही उपस्थित था. इसके अलावा रिश्तेदारों के केवल इस शक पर कि पत्नी पोस्टमार्टम नहीं कराना चाहती थी, उसे दोषी नहीं माना जा सकता. युगलपीठ ने इन विसंगतियों के बाद महिला को तुरंत रिहा करने के आदेश जारी कर दिए.
📊 4. एमपी हाईकोर्ट आदेश 2026: दोनों मुख्य मामलों का संक्षिप्त विवरण
हाईकोर्ट की युगलपीठ द्वारा इस एकल सत्र में दिए गए दो महत्वपूर्ण फैसलों की समीक्षा नीचे दी गई तालिका में संकलित है:
| मामला क्रमांक | मुख्य विषय / पक्ष | हाईकोर्ट की पीठ | कोर्ट का अंतिम निर्देश / टिप्पणी |
| मामला 01 | सुशील उर्फ सुधा बनाम राज्य (भोपाल पति हत्या केस) | जस्टिस विवेक अग्रवाल एवं जस्टिस ए.के. सिंह | निचली अदालत का उम्रकैद का फैसला रद्द, महिला को बाइज्जत बरी करने का आदेश. |
| मामला 02 | अब्दुल माजिद बनाम राज्य (कैदी आहार भत्ता विवाद) | जस्टिस विवेक अग्रवाल एवं जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह | डीजीपी (जेल) का हलफनामा गुमराह करने वाला करार, कैदियों के भोजन का नया विस्तृत शेड्यूल मांगा. |
👮♂️ 5. पुलिस महानिदेशक (जेल) का हलफनामा गुमराह करने वाला: हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
इसी जनहित से जुड़े एक अन्य मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (जेल) द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे को 'गुमराह करने वाला' करार दिया है. युगलपीठ ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, "हमें उम्मीद थी कि जेल प्रमुख केवल हिरासत में मौजूद कैदी के बयान पर निर्भर रहने के बजाय जेल के आधिकारिक रिकॉर्ड, खाने का समय और तय मेन्यू पेश करेंगे. पुलिस हिरासत में मौजूद कैदी से दबाव में कुछ भी कहलवाया या लिखवाया जा सकता है."
🍱 6. अपने दैनिक भत्ते से पुलिसकर्मी खिलाते हैं कैदी को खाना, बजट प्रबंधन पर उठे सवाल
यह पूरा मामला तब सामने आया जब दहेज हत्या के मामले में रीवा जेल में बंद अब्दुल माजिद व अन्य की अपील पर सुनवाई के दौरान पुलिसकर्मी आरोपियों को जबलपुर हाईकोर्ट लेकर आए थे. युगलपीठ ने जब सुरक्षा में आए पुलिसकर्मियों से पूछा कि क्या उन्हें कैदियों के रास्ते के खाने-पीने के खर्च के लिए अलग से पैसे दिए जाते हैं?
तब पुलिसकर्मियों ने बताया कि ऐसी कोई सरकारी व्यवस्था नहीं है. उन्हें केवल अपना दैनिक भत्ता (Daily Allowance) मिलता है और वे उसी पैसे से मजबूरी में कैदियों को भी खाना खिलाते हैं.
📑 7. कोर्ट का कड़ा निर्देश: कैदियों के भोजन का पूरा शेड्यूल और मात्रा रिकॉर्ड पर लाएं
युगलपीठ ने इसे मानवाधिकारों और प्रशासनिक वित्तीय प्रबंधन का गंभीर उल्लंघन माना. कोर्ट ने कहा कि जब कोई कैदी जेल से बाहर कोर्ट ले जाया जाता है, तो उस दिन जेल में उसकी डाइट एंट्री शून्य होनी चाहिए और वह बची हुई राशि उन पुलिसकर्मियों को दी जानी चाहिए जो उन्हें यात्रा के दौरान खाना खिलाते हैं.
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