दो हिस्सों में बंटी प्रदेश की एकमात्र मेडिकल यूनिवर्सिटी; उज्जैन से संबद्ध होंगे इंदौर-भोपाल के कॉलेज
मप्र आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय जबलपुर के विभाजन को कैबिनेट की मंजूरी के बाद स्थानीय स्तर पर विरोध तेज हो गया है। विभाजन से जबलपुर के अधीन अब महज 10 कॉलेज और 2,000 विद्यार्थी ही बचेंगे।
जबलपुर। मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (MPMSU), जबलपुर के विखंडन को राज्य मंत्रिमंडल (कैबिनेट) की औपचारिक मंजूरी मिलने के बाद, संस्कारधानी जबलपुर में इसे केवल एक प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं माना जा रहा है. स्थानीय प्रबुद्ध वर्ग, छात्रों और नागरिक संगठनों द्वारा इसे शहर के ऐतिहासिक व संस्थागत महत्व को कम करने के एक और सुनियोजित प्रयास के रूप में देखा जा रहा है. इस फैसले के बाद से ही पूरे महाकौशल अंचल के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में तीखी बहस छिड़ गई है.
रविवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में 'मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक 2026' को हरी झंडी दे दी गई. इस संशोधन के कानून बनते ही प्रदेश की एकमात्र चिकित्सा यूनिवर्सिटी अब दो स्वायत्त भागों में विभाजित होकर संचालित होगी.
नई प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, महाकौशल और विंध्य अंचल के चिकित्सा (Medical), दंत चिकित्सा (Dental) एवं आयुष (Ayush) कॉलेज ही केवल जबलपुर स्थित विश्वविद्यालय के प्रशासनिक नियंत्रण में रहेंगे. वहीं दूसरी ओर, राजधानी भोपाल, इंदौर, उज्जैन सहित मध्य और पश्चिमी मध्य प्रदेश के सभी शीर्ष कॉलेज उज्जैन में स्थापित होने वाली नई 'धन्वंतरि स्वास्थ्य विश्वविद्यालय' से संबद्ध कर दिए जाएंगे.
इस नए भौगोलिक और प्रशासनिक विभाजन के कारण जबलपुर स्थित मुख्य विश्वविद्यालय के अधीन आने वाले कॉलेजों की संख्या और पंजीकृत विद्यार्थियों के आंकड़े में ऐतिहासिक और उल्लेखनीय कमी आने की पूरी संभावना है. इस अत्यंत संवेदनशील मामले में जब मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलगुरु डॉ. अशोक खंडेलवाल से उनका आधिकारिक पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो उनसे संपर्क स्थापित नहीं हो पाया.
जानकारों और शिक्षाविदों का मानना है कि कुछ वर्ष पहले नर्सिंग और पैरामेडिकल कॉलेजों को इस चिकित्सा विश्वविद्यालय से हटाकर क्षेत्रीय पारंपरिक विश्वविद्यालयों (जैसे आरडीवीवी, आदि) से संबद्ध किए जाने के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा और घातक पुनर्गठन है. वर्ष 2011 में जब इस विश्वविद्यालय की स्थापना जबलपुर में हुई थी, तब इसके क्षेत्राधिकार में पूरे प्रदेश के 550 से अधिक कॉलेज और लगभग 60 हजार विद्यार्थी आते थे.
इस विभाजन के बाद दोनों चिकित्सा विश्वविद्यालयों के आकार, छात्र संख्या और वित्तीय स्थिति में आने वाले बदलावों को नीचे दी गई तालिका के माध्यम से समझा जा सकता है:
| विश्वविद्यालय का नाम व स्थिति | पूर्व में कॉलेजों की संख्या | विभाजन के बाद अनुमानित कॉलेज | वर्तमान छात्र संख्या | विभाजन के बाद छात्र संख्या | अतिरिक्त वार्षिक वित्तीय भार |
| MP आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर | 80+ कॉलेज (नर्सिंग हटने के बाद) | महज 10 कॉलेज (महाकौशल-विंध्य) | 16,000+ छात्र | 1,500 से 2,000 छात्र | — |
| नया धन्वंतरि विश्वविद्यालय, उज्जैन | — | 70+ कॉलेज (मालवा, निमाड़, मध्य मप्र) | — | 14,000+ छात्र | लगभग ₹10 करोड़ प्रतिवर्ष |
मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय को लेकर लिए गए इस प्रशासनिक फैसले ने जबलपुर के नागरिकों के दिलों में दबे पुराने और कड़वे सवालों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है. शहर के विभिन्न सामाजिक, बौद्धिक और व्यापारिक संगठनों का लंबे समय से यह गंभीर आरोप रहा है कि पिछले दो से तीन दशकों में जबलपुर के कई महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक सरकारी संस्थानों के मुख्यालय अथवा उनके प्रमुख प्रशासनिक अधिकार जानबूझकर अन्य शहरों (विशेषकर भोपाल और इंदौर) में स्थानांतरित किए गए हैं.
जबलपुर से स्थानांतरित हुए प्रमुख मुख्यालय व विभाग:
राज्य विद्युत मंडल (MPEB): कभी जबलपुर की रीढ़ माना जाने वाला बिजली बोर्ड अब पूरी तरह विखंडित हो चुका है.
आबकारी आयुक्त कार्यालय (Excise Commissioner Office): प्रशासनिक फेरबदल के नाम पर प्रभाव कम किया गया.
भूविज्ञान एवं खनन संचालनालय: महत्वपूर्ण निर्णय केंद्र अन्यत्र स्थानांतरित.
बीमा संचालनालय एवं अन्य प्रशासनिक विंग: शहर से उनके मूल अधिकार छीने गए.
अब मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय का यह नया विभाजन भी स्थानीय स्तर पर एक बड़े और व्यापक जन-आक्रोश का विषय बन गया है. कई नागरिक और छात्र संगठन इसे जबलपुर की प्रांतीय व संस्थागत भूमिका को लगातार बौना (कम) करने की एक और राजनीतिक कड़ी मान रहे हैं.
वहीं दूसरी ओर, अब स्थानीय राजनीतिक हलकों में भी विपक्ष और अपनों के बीच यह सवाल तेजी से तैरने लगा है कि क्या संस्कारधानी का वर्तमान राजनैतिक नेतृत्व अपने गौरवशाली और प्रमुख संस्थानों को जिले में संरक्षित व सुरक्षित रखने में पूरी तरह से प्रभावहीन साबित हो रहा है? विभाजन और नए इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण पर हर वर्ष करीब 10 करोड़ रुपये का अतिरिक्त सरकारी व्यय भी इस मंदी के दौर में जनता के टैक्स के पैसों की बर्बादी के रूप में देखा जा रहा है.
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