जहां भीषण गर्मी में भी कभी नहीं सूखता पानी! जानिए श्योपुर के भीमलत की पौराणिक कथा
श्योपुर के कराहल क्षेत्र के भीमलत गांव में स्थित पांडव कालीन प्राचीन बावड़ी आज भी ग्रामीणों की आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि वनवास काल में माता कुंती की प्यास बुझाने भीम की लात से जलधारा फूटी थी।
श्योपुर। जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर घने जंगलों और प्राकृतिक वादियों के बीच बसा 'भीमलत' गांव आज भी अपनी एक अनोखी मान्यता और प्राचीन ऐतिहासिक बावड़ी के कारण लोगों की अगाध आस्था का केंद्र बना हुआ है.
स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि महाभारत काल में वनवास के दौरान पांडव इस क्षेत्र से गुजरे थे. जब माता कुंती को तीव्र प्यास लगी और आसपास कहीं पानी का कोई साधन नहीं मिला, तो महाबली भीम ने धरती पर अपने पैर (लात) से भीषण प्रहार किया, जिससे भूमि चीरकर शीतल जलधारा फूट पड़ी.
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह प्राचीन बावड़ी वर्ष भर पानी से लबालब भरी रहती है और इसका जल कभी नहीं सूखता. प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह बावड़ी केवल एक जलस्रोत मात्र नहीं है, बल्कि स्थानीय जनजातीय समुदाय के इतिहास, परंपरा, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है.
भीषण गर्मी या अल्प वर्षा के दिनों में जब आसपास के समूचे इलाके में जल संकट और सूखा पड़ जाता है, तब भी इस बावड़ी का जलस्तर तनिक भी कम नहीं होता.
भीमलत गांव के निवासी पप्पू आदिवासी बताते हैं कि इस गांव का नामकरण ही महाबली भीम के नाम पर हुआ है.
वे अपने पूर्वजों से सुनते आए हैं कि वनवास के दौरान पांडवों का आगमन यहां हुआ था. भीम ने अपनी माता की प्यास बुझाने के लिए धरती पर जो प्रहार किया था, उसी से जल निकला और कालांतर में इसने एक व्यवस्थित बावड़ी का रूप धारण कर लिया. आज भी गांव की कई पीढ़ियां इसी बावड़ी के पानी पर निर्भर हैं.
बावड़ी की विशेषताओं और ऐतिहासिक संदर्भ का संक्षिप्त विवरण नीचे दी गई तालिका में देखा जा सकता है:
| विवरण / मापदंड | पौराणिक व ऐतिहासिक जानकारी |
| स्थान व दूरी | ग्राम भीमलत, कराहल क्षेत्र (श्योपुर से ~35 किमी) |
| पौराणिक संदर्भ | महाभारत कालीन (पांडव वनवास काल) |
| नामकरण का आधार | महाबली भीम द्वारा लात (प्रहार) से जलधारा निकालना |
| जल की स्थिति | बारहमासी (भीषण सूखे में भी जलस्तर अपरिवर्तित) |
| जनसांख्यिकी | प्राथमिक रूप से आदिवासी/जनजातीय आबादी |
गांव के 80 वर्षीय बुजुर्ग मोहरपाल आदिवासी का कहना है कि उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में इस बावड़ी को कभी सूखते नहीं देखा.
इसी गांव के लोहरेक्या आदिवासी कहते हैं कि यह स्थान समूचे क्षेत्र के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है और ग्रामीण इस जल को पवित्र मानकर पूजते हैं.
क्षेत्रीय इतिहास और पुरातात्विक मान्यताओं पर प्रकाश डालते हुए इतिहासकार कैलाश पाराशर ने इस लोक मान्यता की पुष्टि की है.
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