हाथियों को पकड़ने और टाइगर रिजर्व भेजने के तरीकों पर उठे सवाल, कोर्ट ने सरकार को दिए 4 महीने का समय
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को मानव-हाथी संघर्ष और वन्यजीव संरक्षण के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप विस्तृत गाइडलाइन तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने राज्य सरकार को एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने कहा है कि सरकार सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के तयशुदा दिशा-निर्देशों के अनुरूप वन्यजीव संरक्षण, और विशेष तौर पर मानव-हाथी संघर्ष से जुड़े मामलों के प्रभावी प्रबंधन के लिए एक विस्तृत और स्पष्ट गाइडलाइन तैयार करे।
⏳ राज्य सरकार के आग्रह पर कोर्ट ने दिया चार महीने का समय
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से गाइडलाइन तैयार करने के लिए मोहलत मांगी गई, जिसके बाद कोर्ट ने सरकार के आग्रह को स्वीकार करते हुए चार माह का समय प्रदान किया है। इस मामले की अगली सुनवाई अब से ठीक छह महीने बाद तय की गई है।
🐘 छत्तीसगढ़ से आ रहे जंगली हाथियों का मामला और जनहानि
यह पूरा कानूनी मामला रायपुर निवासी नितिन सिंघवी द्वारा दायर की गई एक याचिका के जरिए सामने आया है। याचिका में मुख्य रूप से यह कहा गया है कि पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ के जंगलों से जंगली हाथियों के बड़े-बड़े झुंड लगातार मध्य प्रदेश के जंगलों में प्रवेश कर रहे हैं।
इन हाथियों के कारण स्थानीय किसानों की खड़ी फसलें बड़े पैमाने पर नष्ट हो रही हैं, ग्रामीणों के मकानों को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है, और कई दुर्भाग्यपूर्ण मामलों में इंसानों की जान (जनहानि) भी जा चुकी है।
⚠️ हाथियों को पकड़ने को प्राथमिक उपाय बनाए जाने पर आपत्ति
याचिका में इस बात पर भी कड़ी आपत्ति जताई गई है कि वन्यजीव विशेषज्ञों के नियमों के अनुसार जंगली हाथियों को पकड़ना (रेस्क्यू करना) हमेशा अंतिम विकल्प होना चाहिए, जबकि मध्य प्रदेश में वर्तमान परिस्थितियों में इसे एक प्राथमिक उपाय के रूप में अपनाया जा रहा है।
🎯 पकड़े गए हाथियों को प्रशिक्षण के दौरान पीड़ा देने का आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से पक्ष रखते हुए अधिवक्ता अंशुमान सिंह ने अदालत को बताया कि पकड़े गए हाथियों को टाइगर रिजर्व भेजकर वहां ट्रेनिंग देने की प्रक्रिया के दौरान उन्हें कई प्रकार की अनावश्यक पीड़ा और प्रताड़ना पहुंचाई जा रही है, जिस पर रोक लगनी चाहिए।
📜 सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले और मुआवजे का हवाला
अधिवक्ता ने दलील दी कि 'टीएन गोदावरमन थिरुमुलपाड बनाम भारत संघ' के चर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मानव-वन्यजीव संघर्ष के वैज्ञानिक प्रबंधन, फसल क्षति के लिए उचित मुआवजा नीति और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े बेहद स्पष्ट दिशा-निर्देश देश भर के लिए जारी किए थे।
इन्हीं ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों के अनुरूप मध्य प्रदेश सरकार को भी एक पारदर्शी और प्रभावी नीति तैयार करने का निर्देश देने की मांग याचिका में की गई थी, जिसे हाईकोर्ट ने अब स्वीकार कर लिया है।
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